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Saturday, December 31, 2016

नया वर्ष

बाहर कुछ  बच्चे खेल  रहे थे। कभी दौड़ते ,कभी रुकते, कभी हँसते और कभी एक दूसरे  को छेड़ते।  थोड़ी देर में दो बच्चों के बीच लड़ाई हो गई। एक गुस्से में कुछ बोल रहा था, दूसरा भी चुप नहीं हो रहा था। काफी देर तक दोनों एक - दूसरे से नाराज़ रहे। फिर धीरे- धीरे उनमें थोड़ी बात चीत हुई और फिर वे एक साथ खेलने लगे।
दूर अपने घर में बैठी  रजनी  सब कुछ देख रही थी। वह धीरे से उठी और रसोई की तरफ बढ़ी। उसने  नूडल्स बनाये। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। रजनी ने दरवाज़ा खोला। रेखा दफ्तर से थक कर आयी थी। घर में घुसते ही रेखा ने पूछा,  "माँ क्या बनाया है? बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है।" रजनी ने जवाब दिया , "बेटी तुम्हारे लिए नूडल्स बनाए हैं। नए वर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ।" नए वर्ष में अपनी सास के बदले हुए व्यवहार को देखकर रेखा मुस्कुरा उठी। तभी रजनी ने उसे गले लगा लिया।

उषा छाबड़ा

Saturday, December 24, 2016

ख़ुशी a short story

                                                                   
Merry Christmas 
आज के इस सुंदर  दिवस पर  चलें हम भी किसी के लिए सांता बन जाएँ 
        किसी के चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कराहट ला दें 

        जुगनू बनकर ही सही, कुछ पल उसके भी रोशन कर दें। 


                                  ख़ुशी
सोहनी अपने दफ्तर से लौट रही थी। उसे आज थोड़ी देर हो गई थी। जैसे ही अपने अपार्टमेंट में घुसी वहाँ एक कोने में कुर्सी पर बैठे कपूर अंकल दिखाई दिए। कपूर अंकल बहुत दिनों बाद दिखे थे। 
उन्हें देख कर सोहनी मुस्कराई और पूछा - आंटी कहाँ हैं?
उन्होंने घर की ओर  इशारा किया। उनका घर पहली  मंज़िल पर था।
बूढी कपूर आंटी हमेशा सीढ़ियों के पास कुर्सी पर बैठी मिलती थीं और सोहनी से हर बार कहती थीं कि  कभी आओ, साथ बैठो। आज सोहनी को वैसे ही देर हो रही थी ,पर न जाने क्यों वह ऊपर उनसे मिलने चल पड़ी थी।  वह सीढ़ी चढ़ ही रही थी कि  कपूर आंटी धीरे- धीरे  सीढियाँ उतरती दिखाई दीं। सोहनी वहीँ रुक गई।
कपूर आंटी उसे देखते ही बस ख़ुशी से कह उठीं - अरे! इतने दिनों बाद दिखाई दी हो ? कितना अच्छा लग रहा है , चलो न ऊपर चलो , कभी नहीं आती हो।
आंटी , आपको सरप्राइज देना चाहती थी , अब तो आप मिल ही गई हैं , चलो यहीं मिल लेते हैं।  और बताइए आप कैसी हैं ?
वे तो कुछ सुनने को राजी ही नहीं हुई।  बस ऊपर घर  ही ले गईं उसे.! तभी अंकल  भी ऊपर आ गए।  फटाफट फ्रिज से कुछ चॉक्लेट निकाली और सोहनी को पकड़ा दीं। कपूर आंटी  झट कभी कोई चीज कभी कुछ , बस सामने खाने का सामान रखती चली गयीं। कहा , बस खाओ।
सोहनी उन दोनों को देखे चली जा रही थी। दो महीने विदेश में अपने बच्चों के पास रहकर वे भारत वापिस आए थे। आंटी सोहनी को फटाफट सारी  बातें बताती चली गयीं। सोहनी उनकी आँखों की चमक देख कर मुस्कुरा उठी। उन बूढ़े कपूर अंकल और आंटी के साथ बिताये वे प्रसन्नता भरे पंद्रह मिनट उसे हमेशा याद रहेंगे। 
उषा छाबड़ा
25.12.16 

Sunday, December 18, 2016

A story by khalil-gibran in my voice


Listen the story in my voice at the following link

http://radioplaybackindia.blogspot.in/2016/12/khalil-gibran-audio-usha-chhabra-fiction.html


You can listen other stories in my voice at the following link

http://radioplaybackindia.blogspot.in/search/label/Usha%20Chhabra


Sunday, December 4, 2016

डियर जिंदगी


     डियर जिंदगी
फिल्में वाकई संचार का एक सशक्त माध्यम हैं।आज डियर जिंदगी फिल्म देखने का मौका मिला।
फिल्म ने बड़ी ही सुंदरता से दिखाया कि  जिस प्रकार शरीर के बाकी अंगों में जब समस्या आती है तब हम डॉक्टर के पास जाकर उसका इलाज करना शुरू कर देते हैं, पर जब हम दिमाग में बोझ लिए चलते हैं , जब कुछ ठीक नहीं चल रहा लगता , जब मन में कोई बात दिक्कत पैदा कर रही होती है , हम उससे जूझने में असमर्थता महसूस करते हैं , फिर भी इस बारे में किसी डॉक्टर की सहायता लेना उचित नहीं समझते।  समाज में इस विषय में सब चुप्पी साध लेते हैं।  
दरअसल कई बार बचपन में , या  कभी किसी रिश्ते में  , या कभी अपने काम को लेकर हम परेशान रहते हैं , उस समय वाकई किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता महसूस होती है जो आपको तटस्थ होकर सुने , आपको स्वयं ऐसे ताकत दिलाए जिससे कि  आप उन उलझनों को सुलझा सकें।  आवश्यकता  होती  है किसी ऐसे अपने की। 
समस्याएं जीवन का हिस्सा हैं पर उनसे  उबरना कई बार आसान नहीं होता। बड़े होते हुए बच्चे कई बार ऐसी स्थिति  से गुजरते हैं। उस समय अगर उसके माँ- बाप उससे  समय -समय पर बात करते रहे , उसकी समस्याओं को सुनें , तो धीरे धीरे बच्चे उनसे बाहर निकल जाते हैं।  बच्चे पर गुस्सा न कर , अपने आप को शांत कर , धैर्य से समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।  जिन बच्चों को माता- पिता का यह साथ नहीं मिलता, वे  इसके लिए अपने मित्रों का रुख कर लेते हैं।  कई बार मित्र सही रास्ता दिखाते हैं  , पर कई बार  यह गलत मोड़ ले लेता है।  
ज़िन्दगी में रफ़्तार जरूरी है , पर इतनी नहीं कि हमारे बच्चे हमसे  पीछे छूट जाएँ। ज़िन्दगी जीने के लिए है, बोझिल बनाकर इसे व्यर्थ न करें।  बच्चों के साथ हँसते -खेलते हर लम्हे का आनंद लें । ज़िन्दगी कीमती है । .ज़िन्दगी वाकई नहीं मिलेगी दुबारा, इसे खूबसूरत बनाएँ।   

Wednesday, November 30, 2016

थैंक यू story



My story   थैंक यू   published in Pratilipi.com , children edition

http://hindi.pratilipi.com/read?id=5754389915500544&ret=/search%3Fq%3Dushachhabra

Tuesday, November 15, 2016

Script writing for NTPC

Wrote the Script for ' Mahapran' for NTPC Annual function held on 12. 11.16


Children's day celebration




Celebrated Children's Day in my apartment with kids .

storytelling at IGNCA

got the opportunity to share a story at Kathakar International storytelling Festival during open mic Session held at IGNCA on 11.11.16 



aalekh hamari jimmedari in Hastaksher magazine



आप मेरे द्वारा लिखा आलेख  'हमारी जिम्मेदारी '  निम्नलिखित लिंक पर पढ़ सकते हैं

http://www.hastaksher.com/index.php?ankid=20

Saturday, November 5, 2016

कोट

                             कोट
छुट्टी का दिन था। राधिका अपने काम में व्यस्त थी। कंप्यूटर टेबल पर बैठे वह अपना काम निपटा रही थी। तभी उसे घर  आई  काम करने वाली सुमि ने कहा , "भाभी जी , आज देखो ना बाहर कितना कोहरा है। इस बार ठंड बहुत जल्दी आ रही है, लगता है इस बार  जबरदस्त ठंड पड़ने वाली है ।अभी तो नवंबर शुरू हुआ है और सुबह- सुबह इतनी ठंड लगती है ।"
राधिका काम तो कर रही थी पर जैसे ही उसने सुमि की बात सुनी  बैठे-बैठे वहीं मुस्कुरा दी और कहने लगी ," पिछले साल अधिक सर्दी न पड़ने की वजह से कोई कोट ही नहीं निकला , चलो इस बार तो सब काम आ जाएंगे । "
सुमि बोल पड़ी  ,"यह भी कोई बात हुई भाभी जी ! हम लोगों  का क्या होगा ? इतनी ठंड में पानी में हाथ डालना पड़ता है , कमरे में  भी ठंडे पानी का पोछा  लगाना पड़ता है और चप्पल उतार कर काम करना पड़ता है ।अब आप ही बताओ कड़कती सर्दियों में हमारा गुजारा कैसे होगा ? आपको अपने कोट की पड़ी है। " राधिका सोचने लगी ठीक ही तो कह रही है ।सुमि ने तो जैसे उसकी आंखें  खोल दी थी ।अपने बारे में सोचते -सोचते हम कितना आगे निकल जाते हैं कि दूसरों के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता । तभी राधिका ने उसे कहा," अच्छा , अब सर्दियों में  चप्पल उतार के काम करने की जरूरत नहीं और थोड़ा गीज़र भी चला दिया करूँगी । चिंता मत कर। " राधिका सोच रही थी कि इन सर्दियों में बाकियों का क्या होगा!!

उषा छाबड़ा
5.11.16 

Monday, October 31, 2016

कहानी ' इंतज़ार '


Setu Bilingual सेतु  -  पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित द्वैभाषिक पत्रिका *  में छपी मेरी कहानी ' इंतज़ार ' 

Sunday, October 30, 2016


इंतज़ार (कहानी)

 - उषा छाबड़ा

रानी अपने घर में सोफे पर बैठी सोचे चली जा रही थी। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। बार-बार उसे राकेश की याद आ रही थी। राकेश जो कुछ वर्षों पहले ही विदेश चला गया था। शुरु-शुरु में तो उसकी कुछ ई मेल आईं थीं पर अब उससे संपर्क टूट चुका है। राकेश से वह बहुत नाराज़ थी।दो महीने से उसका कोई अता-पता नहीं। जाने वह कहाँ है, कैसा है ! वहाँ बैठे-बैठे वह अपने ख्यालों में खो गई।
राकेश के साथ समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ जाता था। ऑफिस से उसके साथ ही निकलना और फिर उसके साथ घूमने निकल जाना। कभी किसी फिल्म को देखने, तो कभी अपने घर का कोई सामान खरीदने। कितनी ही मुलाकातें उसकी आँखों के सामने से निकल रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसके बिना अपना खाली वक्त कैसे बिताये!

जब से राकेश विदेश गया था, शाम को वह सीधा घर ही आती थी। घर क्या, बस चारदीवारी से घिरे दो कमरे! सिर्फ सन्नाटा और कुछ नहीं! घर की ओर देखने का मन ही नहीं करता था। उसकी जिंदगी अधूरी सी हो गई थी। थोड़ी बहुत सफाई की, कुछ बनाया, बुझे मन से खाया, किसी किताब के पन्ने पलटे, बस धीरे- धीरे आँखें बोझिल हुईं और नींद आ गई। कई बार तो आधी रात में ही नींद टूट जाती और फिर आने का नाम ही नहीं लेती। फिर राकेश को ई मेल लिखने बैठ जाती जिनका जवाब आने की उम्मीद भी अब शायद ख़त्म हो रही थी। था तो केवल इंतज़ार!

आज बाहर बहुत गर्मी बहुत पड़ रही थी। रविवार का दिन था। ऑफिस में भी तो छुट्टी थी। बहुत दिनों बाद घर की ओर ध्यान गया था उसका ! जगह जगह मकड़ी के जाले झूल रहे थे और उसे जैसे कभी दिखाई ही नहीं दिए थे। सुबह से वह घर की सफाई में लगी हुई थी। दोपहर तक तो थक कर चूर हो चुकी थी।

अभी- अभी वह सोकर उठी ही थी और खिड़की के पास आकर बैठ गई। उसने पर्दा हटाया और खिड़की से बाहर झाँका। शाम हो रही थी। बाहर देखा तो आसमान पर काले बादल एक ओर से घिर रहे हैं। बादलों के साए में सूरज ऐसे छिप रहा है जैसे कि वह राकेश के आगोश में चुपचाप छिप जा जाती थी। न चाहते हुए भी राकेश को वह अपनी यादों से जुदा नहीं कर पा रही थी।. वही तो था जिसने इस अनजान शहर में उसे सहारा दिया था। इस नए शहर में वह अकेली, नौकरी की खातिर आई थी। वह तो किसी को भी नहीं जानती थी। राकेश ने ही तो उसकी सूनी जिंदगी में रंग बिखेरे थे।

वह अब आँगन में आकर खड़ी हो गई थी। दूर पेड़ पर बैठी चिड़िया भी बार - बार अपने घोंसले से बाहर आ जा रही थी जैसे कि उसे भी बारिश का इंतज़ार हो। झुलसती गर्मी में वह भी बेहाल सी जान पड़ रही थी। देखते ही देखते ठंडी सी बयार चल पड़ी। पेड़ों की पत्तियाँ जैसे हवा के संग अठखेलियाँ कर रहीं थीं।
ऊपर काले बादल अलग-अलग आकार लिए उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे जैसे कि किसी अतिथि के आने का सन्देश दे रहे थे। सारे पेड़-पौधे भी इस सन्देश को सुन झूम पड़े थे।

सिर्फ पेड़-पौधे ही क्यों, क्या मनुष्य नहीं! नीचे चलते हुए लोग जिनके चेहरे पर कुछ समय पहले चिंता की लकीरें थीं, प्यास बुझाने के लिए जहाँ पानी बटोरने की जद्दोजहद में पड़े थे , वे भी बारिश के आगमन की ख़ुशी को अपने चेहरे से छिपा नहीं पा रहे थे। एक बार ऊपर देखते , प्रसन्न हो फिर आगे की ओर बढ़ जाते। टप! पहली बूँद गिरी , जिसे प्यासी धरती ने सोखने में एक पल भी नहीं लगाया, बूँद पूरी तह गायब हो गई। फिर, टप – टप- टप---- और जैसे कि किसी नृत्यांगना के पायल की झंकार सबको मदमस्त करने लगी हो।

नन्हीं बूँदे धरती की प्यास बुझा रही थी। रानी मौसम के बदलाव से मन में बदलाव महसूस कर रही थी। जैसे ही कुछ बूँदें उसके चेहरे पर पड़ी, उसे राकेश से मिलने का वह दिन याद आ गया जब ऑफिस के बाहर यूँ ही खड़ी थी और बारिश हो रही थी। राकेश भी उसके ऑफिस में ही काम करता था और उसके पास आकर उसने अपनी गाड़ी रोकी थी। राकेश ने ही उसे तेज बारिश में घर पर छोड़ा था। बारिश में राकेश के साथ हुई पहली मुलाकात कितनी हसीन थी। मन में कुछ न होते हुए भी पता नहीं क्या था जो कि बार-बार दस्तक दे रहा था।
बारिश अब तेज हो रही थी और कितना अच्छा लग रहा था रानी को ! आँगन में जैसे बारिश की बूंदें बेतहाशा गिर रही थीं जैसे कि कह रही हों कि लो तुम्हारा इंतज़ार ख़त्म हुआ ! नीचे सड़क पर धरती तृप्त होती दिखाई दे रही थी। आस-पास पत्तों पर बारिश की बूँदे गिर रही थी। नीचे देखा, जो लोग सड़कों पर थे, वे इकट्ठे होकर पेड़ों के नीचे खड़े हो रहे थे। सभी को घर पहुँचने की बेताबी थी, पर फिर भी भीगते हुए भी उस वर्षा का आनंद ले रहे थे।
तभी रानी ने देखा, दूर एक झोंपड़ी दिखाई दे रही थी, टूटी–फूटी सी! उसका छज्जा अंदर की ओर शायद चू रहा था। एक औरत कभी एक बर्तन लेकर किसी छेद के नीचे रखती तो कभी कोई बाल्टी लेकर अपने घर के किसी एक कोने की ओर भागती। कभी कोई सामान गीला होने से बचाती तो कभी कोई। चेहरे पर सिर्फ शिकन था , कैसे बचा पाएगी वह अपने इस टूटे- फूटे आशियाने को! बाहर जहाँ सब लोग वर्षा का आनंद ले रहे थे, वहीँ इस औरत के लिए ये बारिश की बूँदें चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर रही थीं।

उसका बच्चा इन सब बातों से बेखबर, अपने घर के बाहर खड़ा था। दीन - दुनिया से दूर, अपनी ही धुन में बारिश की टपकती बूँदों से तरह तरह बारिश की बूँदों से खेल रहा था। एक बूँद जैसे ही टपकती उसे अपनी उँगलियों से छिटका देता, अपने चेहरे पर पड़ती नन्हीं बूँदों को पोंछते जाता , खिलखिलाता हुआ हँसता । उसे कितना आनंद आ रहा था ! उसके चेहरे पर कितनी खुशी थी ! उसे सिर्फ अपना खेल समझ आ रहा था, बस खेल !

रानी भी उसे देखकर खिलखिला पड़ी। अपनी बातों को तो जैसे वह भूल ही गई। राकेश के प्रति उसके मन में जो मैल था, वह भी बारिश में धुल गया था। आगे बढ़ने का नाम है ज़िन्दगी ! आज धरती में सोए कितने ही बीज जाग उठेंगे। परिस्थितियां जैसी भी हों, वे उगेंगे। चाहे तो पल- पल को बोझ समझ कर बिता दो या जीवन के पलों को आनंद से जी लो।

उसे भी राकेश को भूलना ही होगा! बारिश ने आज उसे नई राह दिखा दी थी। राकेश का इंतज़ार ख़त्म हुआ। वह अपने कमरे में मुस्कराते हुए चली गई और बड़े ही चाव से अपना कमरा ठीक करने लगी।

Wednesday, October 26, 2016

दीवाली

दीवाली 
दीवाली नजदीक आ रही है। एक बार फिर हम सब इस त्योहार को ख़ुशी- ख़ुशी मनाएँगे। 
स्कूलों में फिर से पटाखों के बिना दीवाली मनाने की बात पर ज़ोर दिया गया है। उन्हें वीडियो दिखाए गए , प्रार्थना सभा में भी पटाखे जलाने के दुष्परिणामों पर चर्चा की गई। विभिन्न तरीकों से इस त्योहार को मनाने की बात की गई। फिर भी आज जब कक्षा छठी में मैंने चर्चा करते हुए यह बात रखी कि - तो इस बार कितने बच्चे दीवाली पर पटाखे जलाएँगे ? चालीस में से कम से कम दस बच्चों ने हाथ खड़े किए। दो- चार शायद झिझक भी रहे थे। उनसे पूछने पर उन्होंने यही कहा - मैम बिना पटाखों के दीवाली कैसे होगी? हमारा तो उनके बिना मन ही लगता। हम तो बचपन से इसी तरह मनाते आये हैं। बच्चों को फिर समझाया गया। दिल्ली की हवा की बात की गई. अभी से ही हवा पांच गुणा ज़्यादा प्रदूषित है , आगे दीवाली के दिन क्या होगा, कितने लोग उस दिन ठीक से सांस नहीं ले पाएँगे , दूसरों को कष्ट पहुंचा कर ख़ुशी मनाना , क्या यही इस त्यौहार को मनाने का तरीका है ? बहुत बातें हुई। अंत में कुछ बच्चों का मन बदला। लेकिन समस्या यहाँ ख़त्म नहीं होती। बच्चे हैं, फिर मन इस तरफ दौड़ेगा। इसका यही उपाय है कि अभिभावक इस ज़िम्मेदारी को निभाएँ। बच्चों का मन बदलने को लिए ठोस कदम उठाने होंगे। हम और हमारे बच्चे ही इस प्रदूषण का शिकार होंगे। बदलते समय के साथ हम भी अपने को बदलें , झट से बच्चों की ज़िद के आगे घुटने न टेक दें। उन्हें समझाएं और धुएं वाले पटाखों और बमों से दूर रखें।
उषा छाबड़ा

26.10.16 

Saturday, October 1, 2016

story samadhan published in magazine Hindi Chetna


 हिंदी प्रचारिणी सभा कैनाडा की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका हिंदी चेतना के बाल साहित्य विशेषांक में मेरी कहानी 'समाधान' पढ़िए। 

Wednesday, September 14, 2016

 हिंदी और हम
आज हिंदी दिवस है।  सुबह से ही शुभकामनाएँ  भी फेसबुक पर दिखाई दे रहीं है और साथ ही साथ हिंदी की दुर्दशा के बारे में भी लिखा हुआ दिखाई दे रहा है।   
मैं जिन बच्चों को पढ़ाती हूँ, उनके माता- पिता अधिकतर यही बताते हैं कि  उनके घर अंग्रेजी के समाचार पत्र आते हैं , हिंदी की तो यह बस यह पाठ्य  पुस्तक ही पढ़ ले तो  बहुत है।  कई कहते हैं कि  मैम ,  हम कई किताबें लाकर देते हैं पर बच्चा  उन्हें हाथ तक नहीं लगाता।  
असल में समाज में हिंदी के बदले हम अंग्रेजी बोलना ज्यादा अच्छा समझते हैं, उसमें  ज्यादा शान  लगती है।  बच्चा असमंजस की स्थिति में रहता है कि  वह किस भाषा पर अधिक काम करे।  

बचपन में बच्चे के साथ आप जितना समय देंगे, उसके  साथ बैठकर कहानियाँ  पढ़ेंगे , उसके बारे में चर्चा करेंगे , घर में जिस भाषा को महत्त्व देंगे , बच्चे  का रुझान उस ओर  ही होगा। घरों में आजकल  अभिभावकों के पास बच्चे के पास बैठने का समय नहीं, हिंदी भाषा को जब   सिर्फ एक विषय  समझा गया ,जिसमें बच्चा पास तो हो ही जाएगा, वहाँ  बच्चे की पकड़, हिंदी भाषा  पर नहीं बन पाती। 
कई बार जब बच्चों को नाटक सिखाते वक्त स्क्रिप्ट लिखने को कहा जाता है , तो हिंदी भाषा में  नाटक लिखने के बजाय वे रोमन लिपि में हिंदी लिख रहे होते हैं, वे हिंदी लिखने से कतराते हैं , हिंदी की कोई भी किताब पढ़ने से हिचकिचाते हैं।  उनके लेखन में भी गहराई नहीं आ पाती।  
अगर हमें नई  पीढ़ी को हिंदी की ऒर आकर्षित करना है तो सबसे पहले अभिभावकों को  अपनी  मानसिकता को बदलना होगा। घरों में  अंग्रेजी के साथ- साथ हिंदी को भी उतना ही महत्तव देना होगा। प्रकाशकों को  हिंदी की किताबों को और आकर्षित बनाना होगा तभी हम आगे आने वाले समय में हिंदी का उठान देख पाएँगे , नहीं तो हर वर्ष इसी तरह हिंदी की समस्याओं का रोना रोते  रहेंगे।
उषा छाबड़ा 
१४.९.१६ 
   

Tuesday, September 6, 2016

                              वाह रे बीमारी !!!
' बीमारी ' यह शब्द किसी को अच्छा नहीं लगता। न तो  बीमार व्यक्ति को ,न ही  बीमार पड़े हुए व्यक्ति के  सगे - सम्बन्धियों को। परंतु आज मैं आपका ध्यान इसके दूसरे  पहलू की ओर ले जाऊँगी.. 

 सोचिये,  बीमार होने पर लोगों द्वारा आपका ख्याल रखा जाना आपको  कितना अच्छा लगता है।  जब तक शरीर  स्वस्थ रहता है , दूसरों के बारे में कुछ पता ही नहीं होता, सब जैसे कि  अपने अपने कामों में लगे होते हैं , किसी  के लिए समय ही नहीं होता। जैसे ही आप बीमार पड़ते हैं , आपके आस- पास वालों की ज़िन्दगी तो वैसी ही व्यस्तता से भरी होती है , उनकी अपनी दिनचर्या वैसी ही होती है , बस आप थोड़े थम से जाते हैं।  बीमार होने पर हमारा शरीर भी पूरी तरह साथ नहीं देता, हर काम धीरे- धीरे और कई बार आप दूसरों के सहारे पड़  जाते हैं।  ऐसे समय में जब परिवार के सब लोग आपका  ध्यान रखते हैं आपको अच्छा लगता है। सब यही पूछते हैं, खाना खाया कि  नहीं , दवा ली कि नहीं , अरे अभी तक मोसम्मी नहीं खायी , अरे, नारियल पानी को हाथ तक नहीं लगाया, चलो जल्दी पी लो , ठीक हो जाओ ! वाह वैसे तो किसी को इतना होश नहीं रहता लेकिन हाँ बीमार पड़ने पर इन  सभी प्रश्नों की बौछार पड़ने लगती है, मन ही मन आप खुश भी होते हैं. ....   जब किसी को आपके बीमार होने की सूचना मिलती है और वह थोड़ा-सा  अपना समय निकाल कर फोन पर बातचीत या एक छोटा- सा मैसेज ही कर देता है तो बस बीमार मन खुश हो जाता है।  डॉक्टर की दवाई के साथ- साथ यह दवाई भी अपना काम कर रही होती है।   आपके माता - पिता, भैया - भाभी, बहनें  , ननदें  , बच्चे, बड़े, रिश्तेदारों,दोस्त/ सहेलियों , आदि  और आस पड़ोस सब जब आपसे हाल चाल जानने को लिए आपसे बात करते हैं आपको अच्छा लगता है, ऐसा लगता है जैसे कि  आप ठीक हो रहे हैं , लोगों को आपकी परवाह है। 
बीमारी  में तो वैसे सारा दिन बिस्तर पर पड़े रहना बहुत अखरता है , फेसबुक पर भी ज़्यादा देर बैठने का मन नहीं करता , किसी की पोस्ट भी पढ़ने का मन नहीं करता , हाँ आपकी बीमारी  से संबंधित   जितनी जानकारी मिल जाए वह कम ही लगती है।    थोड़ा और कुछ पता चल जाए  , थोड़ा यह  पता चल जाए कि  कब तक ठीक हो जाएंगे यही तमन्ना हर समय होती है।  जीने की यही इच्छा तो पूरे संसार को चला रही है।  स्वस्थ रहें , खुश रहें  , यही सब कहते हैं , मैं तो यह भी चाहूंगी चाहे थोड़े दिनों के लिए ही सही , जनाब ज़रा बीमार भी पड़ कर देखिए  और ठीक  होने के बाद ज़िन्दगी और हसीं लगने लगेगी क्योंकि आपके चाहने वाले जो शायद अपने काम की वजह से आपको थोड़ा भूल गए थे, वे आपके सामने फिर आ खड़े होंगे। दोस्तों, जिंदगी अच्छी  है, अपने प्रिय लोगों का थोड़ा- सा साथ उसे और सुंदर  बना देता है।
 तो फिर देर किस बात की ! अगर आपका कोई नज़दीकी थोड़ा -सा बीमार है तो बस उससे बातें करने के लिए सिर्फ दो मिनट निकालिये, उस व्यक्ति को थोड़ा अच्छा महसूस कराइए, उसके आज के दिन को खुशनुमा कर दीजिये। अधिक नहीं, एक प्यारा - सा मैसेज ही काफी है। 
उषा छाबड़ा 
६. ९. १६  

Thursday, August 25, 2016

नोट
लघु कथा
जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में एक माँ अपनी बच्ची को मंदिर लेकर गई। मंदिर सुंदर सजा हुआ था। बच्ची ने दस रुपये का एक नोट नन्हे कृष्ण जी के झूले में डाल दिया और उन्हें झूला झुलाया। वह बहुत खुश थी। उसकी माँ वहीँ बैठ गई। थोड़ी ही देर में बच्ची माँ के पास आई और माँ के पर्स में और पैसे दूँढने लगी। माँ के पर्स में एक दस का, एक सौ का और एक पांच सौ का नोट था। बच्ची ने पांच सौ का नोट पकड़ लिया और वह चढाने के लिए ज़िद करने लगी। माँ घबरा गयी। पाँच सौ का नोट। !! माँ ने कहा ,"अभी तो भगवान जी को चढ़ाया है , अब और नहीं चढ़ाना।" बच्ची ने कहा ," नहीं , दूसरे भगवान जी जो मंदिर में हैं उन्हें चढ़ाना है।" फिर उसे समझाया गया कि जब एक भगवान को चढ़ाया तो सब मिलकर उसी में से आपस में बाँट लेंगे। बच्ची फिर भी ज़िद पर अड़ी हुई थी। माँ उसे फिर पर्स में से दस रुपये का नोट निकाल कर दे रही थी पर बच्ची थी कि राजी ही नहीं हो रही थी। वह पाँच सौ के नोट को ही चढ़ाने पर ही अड़ी हुई थी। माँ को भी उसे मना करने में दिक्कत महसूस हो रही थी और बच्ची थी कि मान ही नहीं रही थी। थोड़ी देर बाद माँ ने उसे डाँटा ," नहीं ,ये नहीं चढ़ाना है। बार बार ज़िद क्यों कर रही हो ? " तभी बच्ची बोल पड़ी ," ये नोट नरम (सॉफ्ट) सा है , मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे कड़क (हार्ड) नोट चाहिए।" माँ को अब समझ आई कि बच्ची क्या चाहती थी! असल में बच्ची को कड़क नोट उस पेटी में डालना था । पर्स में सिर्फ पांच सौ का नोट ही कड़क था , इसलिए वह उसे लेने की ज़िद कर रही थी। अब समस्या को कैसे सुलझाया जाए। फिर उसे यह कहा गया कि भगवान जी के झूले में यह नरम वाला दस रुपए का नोट डाल आओ और वहाँ से कड़क नोट ले आओ। बच्ची ने देखा कि एक बूढी महिला ने अभी - अभी एक कड़क दस का नोट झूले में डाला है। उसने जल्दी से अपना नोट झूले में डाला और दूसरा कड़क वाला दस रुपए का नोट उठा लिया। वह ख़ुशी- ख़ुशी दस का कड़क नोट पेटी में डाल आई । अब बेटी भी खुश थी और माँ भी !!!
उषा छाबड़ा
२५. ८. १६

Wednesday, August 24, 2016

नन्हा सा सलोना कृष्ण, 
पैरों में पैंजनी और होठों पर बाँसुरी ,
मुँह पर माखन और प्यारी मुस्कान 
ओह , कितना प्यारा रूप है तेरा कान्हा !!
कैसे तू इतना नटखट हुआ ! 
कैसे पूतना को मार गिराया !
कैसे सब गोपियों को वश में किया !
कैसे अपनी उँगलियों पर गोवर्धन उठाया!
कैसे कंस का वध कर डाला!
कैसे द्रौपदी की लाज रखी !
कैसे गीता की रचना की !
कैसे तुमने इतने चमत्कार दिखाए !!
कैसे एक रूप में, इतने रूप समाये!!
तुम कर्मयोगी, तुम दार्शनिक ,
तुम साधारण में असाधारण ,
तुम ही प्राण, तुम ही आधार ,
कोटि नमन तुम्हें हे पूर्णावतार।
उषा छाबड़ा
२४. ८. १६

Sunday, August 21, 2016



                 इस सप्ताह के सुविचार

  • पहला कदम है खुद पर भरोसा , बाकी कदम खुद - ब- खुद उठते चले जाएँगे ।
  • आपका आज का एक कदम , भविष्य की ओर बढ़ा एक कदम है। हिम्मत करें , आगे बढ़ें।
  •  कुछ अलग करने की चाह ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। इस चाह को जब कर गुज़रते हैं तो दुनिया वाकई बदल जाती है।
  • कई बार हम नकारात्मक भावों से घिर जाते हैं, वैसा ही सोचने लगते हैं। उस चक्रव्यूह को तोड़कर निकलना ही तो ज़िन्दगी है।
  • व्यक्ति को गिनती की सांसें मिली हैं, जो कुछ करना है उसी में करना है, तो क्यों न हर एक पल कुछ अच्छे काम में बिताएँ।
         उषा छाबड़ा 
          २१.८ .१६ 



Friday, August 19, 2016

                                                         हमारी ज़िम्मेदारी
बच्चे की परवरिश अपने- आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है।  बच्चे को विद्यालय भेजते समय अभिभावकों के  मन में बहुत उम्मीदें होती हैं। मन में ख़ुशी होती है कि  बच्चा पढ़- लिखकर एक अच्छा व्यक्ति बनेगा, परिवार और देश का नाम रोशन करेगा।
लेकिन इस सब के साथ  एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी आती है।  अकसर देखा गया है कि  बच्चे के एडमिशन और उसके एक दो साल बाद तक तो अभिभावक बच्चे की बातों को ध्यान से सुनते हैं , उसके विद्यालय में दिन- प्रतिदिन होने वाली पढ़ाई  और गतिविधियों में भी रोचकता दिखाते हैं , पर धीरे- धीरे वे बच्चे को अपने हाल पर छोड़ देते हैं।  बच्चे की नींव  कमजोर पड़ने लगती है।  इस बात को वे नजरअंदाज कर देते हैं यह कह  कर कि  कोई बात नहीं  , सामान्य अशुद्धियाँ या गलतियाँ  हैं  , अपने -आप ठीक हो जाएँगी, पर यही गलतियाँ   आगे जाकर बड़ा रूप ले लेती हैं।
अकसर देखा गया है कि  बड़ी कक्षाओं में आकर बच्चे अपनी कापियों में काम गंदा करने लगते हैं , अधूरा काम भी जाँचने  के लिए दे  देते हैं , लिखावट पर भी ध्यान नहीं देते, भूल सुधार  नहीं करते।  अक्षरों  की बनावट भी गलत होती है, फिर भी वे एक 'चलता है' का रवैय्या अपना लेते हैं।  अध्यापिका द्वारा बताये जाने पर भी बच्चे उस बात पर पूरी तरह  अमल नहीं करते।
बच्चे की पढ़ाई  में अभिभावक, शिक्षक और बच्चे की भागीदारी होती है।  इन तीनों के सम्मिलित प्रयास से ही बच्चा आगे बढ़ सकता है, एक दूसरे पर दोषारोपण करने से नहीं।
काम सफाई से करना, समय पर और पूरा काम करके जाँचने को लिए देना एक कौशल  है जो किसी विषय तक सीमित नहीं है।  बच्चा चाहे बड़े होकर अपना काम करे या कोई भी नौकरी करे, यह कौशल  उसे हर क्षेत्र में काम आएगा ।
कच्चे घड़े को  ही  आप   बाहर से ठोक -पीटकरऔर अंदर से थपकी देकर  आकार दे सकते  हैं , पक जाने पर कुछ नहीं हो पाता , उसी प्रकार बच्चे के बचपन में ही आप उसके कौशल को बढ़ा सकते हैं , उसके चरित्र को सुंदर रूप  दे सकते हैं।  अतः अभिभावक हों या शिक्षक, सब को एक साथ मिलकर प्रयास करना होगा। बच्चे के लिए ऐसा वातावरण निर्मित करना होगा जिसमें बच्चा अपने -आप को अकेला न समझे, उसका मार्गदर्शन करने के लिए उसके अभिभावक और शिक्षक दोनों हों।
एक बच्चा देश का एक भावी वयस्क होगा जिसे तरह तरह की ज़िम्मेदारियाँ निभानी है और वह हर प्रकार से सशक्त हो ,यह  हमारी जिम्मेदारी है।  आइए मिलकर इसे निभाएँ।
उषा छाबड़ा
१९. ८ . १६   

Wednesday, August 17, 2016


                                                        स्टार
लघु कथा
हम सब बचपन से ही कहानियां गढ़ने में तेज़ होते हैं।  सभी कहानियां बुनते हैं।  एक छोटा बच्चा बैठे बैठे कभी  शेर बन जाता है तो कभी हाथी।  इतने बड़े हाथी  से चूहा बनने में में भी उसे एक सेकंड नहीं लगता। अभी हाल ही में एक बच्चा अपनी बस में बैठा हुआ अपने घर जा रहा था।  उसकी दोनों हथेलियों  में उसकी अध्यापिका ने एक- एक  स्टार  बना दिया था । बच्चा पूरे रास्ते अपने स्टार देखता रहा और उसके बारे में जाने कितनी बातें बुनता गया और अपने आस पास बैठे बच्चों को सुनाता गया ।  तभी किसी बच्चे ने उसकी हथेली  से अपनी हथेली रगड़ कर कहा ,"देखो मैंने तुम्हारा स्टार ले लिया" और वह बच्चा तो बस गुस्से से भर गया।  बार- बार अपना स्टार देखता फिर उसकी हथेली और फिर बोलता ,"नहीं मिला ,नहीं मिला।" बार बार वह फिर सबको अपना स्टार दिखाता , हँसता लेकिन फिर भी कहीं आशंका थी कि  कहीं इसने स्टार ले तो नहीं लिया।  उसके उस दिन के सफर में वह स्टार उसका साथी था।  कहानियों के उस छोटे जादूगर का हमसफ़र उसका छोटा सा स्टार !! उसे कैसे वह किसी को दे सकता था।
उषा छाबड़ा
१७.८ . १६  

Tuesday, August 2, 2016

मेरी आवाज़ में सुनें कहानी
बंद दरवाज़ा
Anurag Sharma
8 hrs

उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी कलम पर हाथ बढाया कभी कागज़ पर।
(प्रेमचंद की 'बंद दरवाज़ा' से एक अंश)
http://radioplaybackindia.blogspot.com/…/band-darwaza-premc…

Saturday, July 30, 2016


उपन्‍यासकार सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती 31 जुलाई को प्रतिवर्ष बड़े ही उत्‍साह से मनाई जाती है . उनकी कहानियों के अपार भंडार से मेरे द्वारा उनकी कुछ कहानियों जैसे ईदगाह, कज़ाकी , ठाकुर का कुआँ , बूढ़ी काकी , नशा आदि का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया जाएगा। आप सब का हार्दिक स्वागत है।




बचपन में हम अपने दादा - दादी, नाना - नानी, आस- पड़ोस से कहानियाँ सुनकर बड़े होते है। कहानियों की दुनिया में पात्र जीवित हो उठते हैं , वे पात्र हमसे संवाद करते हैं और हमारे मानस पटल पर एक छाप छोड़ जाते हैं। इन कहानियों की विचित्र पर प्यारी दुनिया में एक बार फिर आपका स्वागत है। आइए एक बार बच्चा बनकर उन पलों को जी लें।

Saturday, July 9, 2016

storytelling session 

Thursday, June 30, 2016


पढ़िए मेरे द्वारा लिखी कहानी अनोखा रिश्ता ( सत्य कथा पर  अाधारित )

http://www.setumag.com/2016/06/usha-chhabra-anokha-rishta.html

30.6.16

Wednesday, June 29, 2016

Tuesday, June 28, 2016




कितना पैसा


मधुर खिड़की के पास खड़ा बाहर देख रहा था। बाहर सुंदर-सुंदर मकान दिखाई दे रहे थे और बड़े-बड़े वृक्ष सड़क के दोनों के किनारे खड़े थे । मधुर इतना सब कुछ पा चुका था विदेश में आकर, लेकिन कहीं ना कहीं उसका दिल अभी भी वहीँ बसा था अपने मां-बाप के पास जिन्हें वह भारत  छोड़ आया था । कल की ही तो बात है । यहाँ कई भारतीय थे जो होली खेल रहे थे , पर माता- पिता के साथ यूँ ही समय बिताना भी अच्छा लगता था । कल तो वह सबके बीच होने पर भी कितना अकेलापन महसूस कर रहा था ।
उसके पिताजी शुरु से ही क्रोधी  स्वभाव के थे । वे बहुत जिद्दी भी थे ।  जल्दी से किसी की बात नहीं मानते थे । उसने तो पिताजी को मनाने की कोशिश भी की कि वे भी साथ चलें पर वे नहीं माने । मधुर जानता था कि उन्हें साथ लाना इतना आसान नहीं है खर्च बहुत बढ़ जाएगा, लेकिन उन्हें साथ आने के लिए कहना तो उसका फ़र्ज़ था ।
उसे याद है जब भी उसे कोई चीज खाने की पसंद नहीं आती तब माँ खाना खा रही हो तो भी  बीच में  ही खाना छोड़कर रसोई की तरफ जाती और उसका मनपसंद खाना बनाती । आज वह अपनी मां को वहीँ  छोड़कर विदेश में अपने परिवार के साथ रह रहा है । जल्दी  फोन भी नहीं करता क्योंकि एक ही प्रश्न पूछा जाता है, कब आ रहे हो बेटा?
उसे पता चला है कि उसके पिताजी की आँखों का ऑपरेशन होने वाला है । पहले भी कुछ महीनों पहले  जब उसके पिता के घुटनों का ऑपरेशन हुआ वह नहीं जा पाया था । यहाँ भी उसे नींद कहाँ आती थी! उसे याद है पिताजी किस प्रकार लेटकर उसे पावों से झूला झुलाते थे,
अब भी उसके पिताजी की आँखों का ऑपरेशन है और वह अपने परिवार के साथ विदेश में रह रहा है. सभी लोग यह समझते हैं कि उसे अपने माता – पिता की परवाह नहीं । पर मधुर जानता है क्यों ? कितना मजबूर है वह ! वह नहीं आ सकता । अभी हाल ही में तो  यहाँ आकर बसा  है । वहां पर खर्च बहुत है और विदेश से भारत आना इतना आसान थोड़े ही है । फिर वह कुछ सोच कर कुर्सी पर बैठ जाता है । उसके मन में यह बात आती है कि भारत  कितने दिन रहेगा ? दो  दिन या तीन  दिन, फिर से वापस वापस आना ही होगा और इतने दिनों का खर्च भी कितना हो जाएगा । कोई फायदा नहीं । उसे याद है उसके घर के पास एक भइया रहते हैं ,बहुत अच्छे हैं वह उसके  मां-बाप का तो पूरा ध्यान रख लेते हैं । उन्हीं को फोन कर दूँगा । वह सब संभाल लेंगे। अब चिंता नहीं ।
मधुर के माता- पिता मधुर की स्थिति को जानते हैं पर दिल तो आखिर दिल है ।
मधुर को क्या पता उसके माता पिता उस दो-तीन दिनों में भी कितनी खुश हो जाएँगे उनकी आँखे तरस गई है अपने पुत्र को, अपने बच्चे  को देखने के लिए । वह क्यों नहीं समझता है । उसकी अपने माता  पिता के  प्रति  जिम्मेदारियाँ भी है । क्या हुआ जो पैसे खर्च हो जाएँगे ! कम पैसों में उन लोगों ने किस तरह मधुर की परवरिश की । क्या उसे छोड़ दिया था उन्होंने? आज भी जब फोन की घंटी बजती है दोनों लपक कर उठाते हैं शायद मधुर का फोन हो । लेकिन नहीं , कभी दूकानदार का फोन होता है तो कभी नल की मरम्मत करने वाले का । मधुर का फोन आए तो अरसा बीत गया है ।
मधुर के पिताजी तो बस अपनी दुनिया में ही खो गए हैं, उन्हें सिर्फ अपनी चिंता है, ऑपरेशन कब होना है , कहाँ होना है कैसे जाना है , डॉक्टर से बात हुई क्या, दिन में कितनी ही बार पड़ोस में रह रहे रमेश को फोन कर डालते हैं । रमेश कई बार झुंझला जाता है पर फिर सोचता है , चलो कोई बात नहीं । वह नहीं  करेगा तो कौन करेगा । कोई उपाय भी तो नज़र नहीं आता ।
मधुर की माँ तो समय से पहले ही बूढ़ी  हो गयी है । जब से मधुर के पिताजी का घुटनों का ऑपरेशन हुआ है , उनका घर से निकलना ही बंद हो गया है। वे नीचे ही नहीं उतरती. सब्जी वाला, दूध वाला सब घर पर ही सामान दे जाते हैं , फोन करते ही हाजिर । बस मधुर ही नहीं हाजिर हो पाता । खाने पीने का भी क्या है , एक ही बार में दो बार का काम हो जाता है । वैसे तो कोई उनके घर जल्दी नहीं आता, आकर भी कोई क्या करेगा, फिर वही पुरानी बातें , वही प्रश्न मधुर का फोन आया , वह  आ रहा है क्या, कब तक आएगा । कब तक सच को झुठलाते रहेंगे, कब तक इन प्रश्नों को झेलते रहेंगे!!
कभी कभार जब कोई आता है तो फट से उस सामान की ओर बढ़ जातीं हैं जो कोई अपने साथ लाता है । जीभ का स्वाद कम नहीं हुआ है, पति तो डायबिटीज के मरीज़ है पर वह तो नहीं, उन्हें  तो खाने पीने का शौक है । पर समय से पहले ही जैसे किसी ने उन इच्छाओं को दबा दिया है । पर इच्छाएं कहाँ दबती है, जीभ तो किसी की भी सगी नहीं होती, तो उनकी भी नहीं ।
एक तरफ मधुर है जो विदेश चला तो गया है,  अपने माता- पिता से मिलने के लिए इतना खर्च उठा पाने में सक्षम  नहीं , अपने परिवार को देखे या अब पिछले सम्बंधोॱ को । दूसरी तरफ उसके पिता हैं, जो वास्तविकता से भली- भांति परिचित हैं , बेटे के  आने की उम्मीद छोड़ चुके हैं, भूलने की बीमारी में अपने बेटे की यादें भी शायद धुंधली हो रहीं हैं, और तीसरी ओर उसकी माँ है, जो रह- रह कर बातों ही बातों में कई बार मधुर का नाम ले लेती है, उन्हें  उसके आने की उम्मीद अभी भी है, आखिर माँ जो ठहरी!! माँ तो  माँ ही होती है । पैसे कमाने की धुन ने सबको अलग कर दिया है! आखिर कितना पैसा चाहिए आदमी को!!!
 लेखिका : उषा छाबड़ा

Monday, June 27, 2016


आजकल फेस बुक पुरानी तस्वीरों को सामने ला देता है , हमारी यादें ताज़ा करवाता है या यूँ कहें कि पुरानी कहानियों को तरोताजा कर देता है।
कहानी ---
जैसे ही माँ - पिताजी , दादी -दादा , नानी- नाना , चाचा- चाची या कोई भी व्यक्ति कहता है चलो एक कहानी सुनाते हैं , सब के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसा क्या है कहानी में !! कहानी में एक राजा हो या भिखारी, परी हो या शहज़ादी , सुर हो या असुर और ऐसे सजीव कोई न भी हो तो भी एक निर्जीव सी पेंसिल की भी एक कहानी बन जाती है। कहानी सबको एक अलग ही दुनिया में ले चलती है , कहानी का अपना अलग ही आनंद है। इसे सुनने का भी एक अलग मज़ा है। कहानी में हम कई बार किसी किरदार से ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे कि वह हमारा ही अक्स हो। उसे दुःख पहुँचता है तो हम दुखी होते हैं , वह खुश होता है तो हम भी खुश हो जाते हैं। कहानी में ही हम अपने जीवन के प्रश्नों का हल खोजने लगते हैं। कई बार कहानी हमें ऐसे कल्पना लोक में ले जाती है कि उसी में समय बिताने का मन करता है।
कहानी सुनाना भी एक कला है। कहानी सुनाते समय सबकी आँखें , सबके कान बस कहानी सुनाने वाले की तरफ ही लगे होते हैं। अगर सुनाने वाला ढंग से कहानी नहीं सुनाता तो कहानी टूटने लगती है। सब चिल्ला उठते हैं, "क्या हुआ भाई ? समझ नहीं आया!"
यह पूरा संसार कहानियों का ही तो पिटारा है। यहाँ हर पल एक नई कहानी बुनी जाती है!! कहानी सुनें और सुनाएँ।
उषा छाबड़ा
27.6.16

Sunday, June 26, 2016

                              गर्मी की छुट्टियाँ
गर्मी की छुट्टियाँ !! जिस प्रकार बच्चों को इसका इंतज़ार रहता है वैसे ही हम अध्यापकों एवं अध्यापिकाओं को भी रहता है भई, हम भी तो बच्चों के संग रहकर बच्चे  बन जाते हैं न !
तो लीजिए आ गई गर्मी की छुट्टियाँ  ! २१ तारीख से हम भी  लगे इस छुट्टी के मज़ेबच्चों की फरमाइशें , कुछ मियां जी कीं और फिर  अपनी तो थी हीं बस पहला सप्ताह तो जाने कहाँ उड़ गया पता ही नहीं चला
अगले सप्ताह भी कुछ घर  के काम निपटाने में निकल रहा था कि नज़र पड़ी एक निमंत्रण पर जो कि अभिनव बालमन के तीन दिवसीय कार्यशाला की थी, वो भी अलीगढ़ में निमंत्रण पत्र पर देखा कि कवि रावेंद्रकुमार रवि जी भी बच्चों को कविता सिखाने आने वाले हैं तो बस फिर क्या था चल पड़ी हमारी सवारी अलीगढ की ओर हमारे मियां जी ने राय दी, चलो आगरा भी हो लेंगे हमने भी एक पल की देरी नहीं की और जी सुबह गाडी में बैठ चल दिए यमुना एक्सप्रेस हाईवे  पर।  पहली बार सफ़र कर रहे थे उसपर पहले -पहले तो अच्छा लग रहा था पर हमारे साहब जी को यूँ सीधे -सीधे रास्ता नापने  में आनंद नहीं आ रहा था थोड़ी देर बाद जब अलीगढ के लिए हम एक्सप्रेस वे से अंदर की ओर मुड़ गए तो इनकी तो जैसे जान में जान आई मैंने इनकी तरफ देखा आनंद की तो सीमा ही नहीं थी मुझे इस आनंद  का कारण  समझ नहीं आया पूछने पर इन्होंने बताया कि इतने वर्षों बाद उत्तर प्रदेश की सड़क दिखाई दी है जिसमें दोनों तरफ लोग दिखाई  दे रहे हैं , उनकी बोली सुनाई दे रही है उनके खपरैल के मकान , कच्ची सड़कें जिसमें ढोर- डंगर दिखाई दे रहे हैं , आनंद तो इस प्रकार की सड़क पर गाडी चलाने में है , सीधे सीधे जहाँ रौनक ही नहीं वहां क्या मजामुझे समझ आया कि व्यक्ति चाहे अपने जन्म स्थल से चाहे कितनी ही दूर क्यों न रहे , चाहे कितनी ही आराम की जिन्दगी क्यों न जी रहा हो , एक बार अपने प्रदेश में जब पहुँचता है तो उस आनंद को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता
रस्ते में हम चाय पीने के लिए एक ढाबे पर रुके मैंने चाय पीते- पीते उस ढाबे वाले से यूँ ही पूछ लिया कि जी  कितने सालों से आप ये ढाबा चला रहे हैं   मेरा पूछना ही था कि सुंदर - सा जवाब आया बड़े गर्व  के साथ उसने कहा कि जी हमारा  ढाबा तो जी यहाँ का सबसे पुराना ढाबा है , बीस साल से भी ऊपर हो गए जी चलाते  कितना  आत्म - विश्वास, कितना सुख, उसके  इस उत्तर में मैं यहाँ उसे शायद लिख पाने में भी सक्षम महसूस नहीं कर रही जहाँ इतने वर्ष नौकरी करके , उससे अधिक शायद कमा कर भी , इस तरह का उत्तर मैं अपने लिए नहीं दे पाती थोड़ी कमाई में भी संतुष्टि उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी
चाय पीकर आगे रवाना हुए और पहुँच गए निश्चल जी एवं उनकी टीम द्वारा चलाई जा रही  कार्यशाला  में सभी  अपने काम में व्यस्त तरह - तरह की  कक्षाएँ  लगी हुई थीं और बच्चे सीख रहे थे हमारा अभिनन्दन हुआ , आवभगत हुई मंच पर स्थान मिला , बच्चों से संबोधन करने का मौका मिला किसे यह सब अच्छा नहीं लगेगा सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब रावेंद्रकुमार  रवि  जी से मुलाक़ात हुई और मैंने उनसे कविता लिखने का गुर सीखाज्ञान  तो जहाँ मिले  वहां  झट पहुँच जाना चाहिए।
फिर थोड़ी देर रुक कर हम आगरा की ओर रवाना हुए आगरा में बीना जी से मुलाकात हुईबीना जी के ngo  प्रयास के बारे में विस्तार से जाना शर्मा जी और बीना जी दोनों का व्यक्तित्व प्रभावी है और उनकी बातों से हम दोनों बहुत प्रेरित हुए
अगले दिन सुबह सुबह ताजमहल की सुन्दरता निहारने निकल पड़े सुबह ६.३० बजे सामने से ताजमहल को देखा जिसके पीछे सफेद बादलों का झुण्ड था इच्छा हुई कि बस यह  पूरा दृश्य आँखों में कैद कर लिया जाए कैमरा भला इसे कैसे समेट सकता था !
वहाँ  से निकलते समय एक छोटी सी बात हुई एक महिला अपने बच्चे को ताजमहल दिखाने लाई थी बच्चे को वह बताने का प्रयत्न कर रही थी - देखो बेटा, ताजमहल !! बच्चे ने सरसरी निगाह से देखा फिर कह  उठा,  माँ  ताज भवन ? माँ कुछ कहती कि तभी बच्चे को एक उछलती - कूदती गिलहरी दिख गई और वह बोल पड़ा,  माँ, गिलहरी ! माँ, गिलहरी !” वह उसके पीछे भागने लगा  मेरे मन में विचार आया कि बच्चे की रूचि जीते जागते उस नन्हे से जीव में है , उस पत्थर के ताजमहल में नहीं क्या ऐसा ही हम बच्चों की शिक्षा के साथ नहीं करते जो शिक्षा बच्चों को खुले आसमान के नीचे  मिलनी चाहिए  क्या उसे हम वह न देकर बंद कमरों में वह पढ़ाने की कोशिश नहीं करते जो वह पढ़ना ही नहीं चाहता
खैर  , हम बीना जी के ngo के बच्चों से मिलने चल दिए. उन्होंने इतना कुछ सीख रखा था जिसके बारे में सोच भी नहीं सकती थी बच्चों ने मुझे मेरी पुस्तक  'ताक  धिना  धिन ' से गीत सुनाये।
मेरी ख़ुशी का   ठिकाना  ही नहीं था। मैंने भी उन्हें कुछ कविताएँ और कहानियाँ  सुनाईं।
वहीँ से वापसी हुई और हम सब यादों को समेटते हुए दिल्ली लौटे जब गाड़ी में साँस लेना दूभर होने लगा था, तो यहाँ की प्रदूषित हवा महसूस होने लगी  सच बाहर से आने पर ज्यादा पता चलता है  यहाँ रहते हुए तो जैसे प्रदूषित हवा की आदत पड़  गई है
बाकी छुट्टियाँ  भी ऐसे ही कई  कहानियाँ  और कविताएँ  सुनाने में बीतीं।  कई  नए बच्चों से   दोस्ती  हुई उनकी चर्चा फिर कभी।


इतना अवश्य कहना  चाहूँगी  कि  जीवन का हर पल  हमें कुछ सिखा  जाता है। आवश्यकता है बच्चों की तरह जिज्ञासु बनने की, सिर्फ अपनी  इंद्रियों को सचेत  रखने की,   कुछ भी सीखने   के  लिए  हर  समय तत्पर  रहने की ।   
उषा छाबड़ा

26.6.16