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Wednesday, October 26, 2016

दीवाली

दीवाली 
दीवाली नजदीक आ रही है। एक बार फिर हम सब इस त्योहार को ख़ुशी- ख़ुशी मनाएँगे। 
स्कूलों में फिर से पटाखों के बिना दीवाली मनाने की बात पर ज़ोर दिया गया है। उन्हें वीडियो दिखाए गए , प्रार्थना सभा में भी पटाखे जलाने के दुष्परिणामों पर चर्चा की गई। विभिन्न तरीकों से इस त्योहार को मनाने की बात की गई। फिर भी आज जब कक्षा छठी में मैंने चर्चा करते हुए यह बात रखी कि - तो इस बार कितने बच्चे दीवाली पर पटाखे जलाएँगे ? चालीस में से कम से कम दस बच्चों ने हाथ खड़े किए। दो- चार शायद झिझक भी रहे थे। उनसे पूछने पर उन्होंने यही कहा - मैम बिना पटाखों के दीवाली कैसे होगी? हमारा तो उनके बिना मन ही लगता। हम तो बचपन से इसी तरह मनाते आये हैं। बच्चों को फिर समझाया गया। दिल्ली की हवा की बात की गई. अभी से ही हवा पांच गुणा ज़्यादा प्रदूषित है , आगे दीवाली के दिन क्या होगा, कितने लोग उस दिन ठीक से सांस नहीं ले पाएँगे , दूसरों को कष्ट पहुंचा कर ख़ुशी मनाना , क्या यही इस त्यौहार को मनाने का तरीका है ? बहुत बातें हुई। अंत में कुछ बच्चों का मन बदला। लेकिन समस्या यहाँ ख़त्म नहीं होती। बच्चे हैं, फिर मन इस तरफ दौड़ेगा। इसका यही उपाय है कि अभिभावक इस ज़िम्मेदारी को निभाएँ। बच्चों का मन बदलने को लिए ठोस कदम उठाने होंगे। हम और हमारे बच्चे ही इस प्रदूषण का शिकार होंगे। बदलते समय के साथ हम भी अपने को बदलें , झट से बच्चों की ज़िद के आगे घुटने न टेक दें। उन्हें समझाएं और धुएं वाले पटाखों और बमों से दूर रखें।
उषा छाबड़ा

26.10.16 

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