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Thursday, June 30, 2016


पढ़िए मेरे द्वारा लिखी कहानी अनोखा रिश्ता ( सत्य कथा पर  अाधारित )

http://www.setumag.com/2016/06/usha-chhabra-anokha-rishta.html

30.6.16

Wednesday, June 29, 2016


Tuesday, June 28, 2016




कितना पैसा


मधुर खिड़की के पास खड़ा बाहर देख रहा था। बाहर सुंदर-सुंदर मकान दिखाई दे रहे थे और बड़े-बड़े वृक्ष सड़क के दोनों के किनारे खड़े थे । मधुर इतना सब कुछ पा चुका था विदेश में आकर, लेकिन कहीं ना कहीं उसका दिल अभी भी वहीँ बसा था अपने मां-बाप के पास जिन्हें वह भारत  छोड़ आया था । कल की ही तो बात है । यहाँ कई भारतीय थे जो होली खेल रहे थे , पर माता- पिता के साथ यूँ ही समय बिताना भी अच्छा लगता था । कल तो वह सबके बीच होने पर भी कितना अकेलापन महसूस कर रहा था ।
उसके पिताजी शुरु से ही क्रोधी  स्वभाव के थे । वे बहुत जिद्दी भी थे ।  जल्दी से किसी की बात नहीं मानते थे । उसने तो पिताजी को मनाने की कोशिश भी की कि वे भी साथ चलें पर वे नहीं माने । मधुर जानता था कि उन्हें साथ लाना इतना आसान नहीं है खर्च बहुत बढ़ जाएगा, लेकिन उन्हें साथ आने के लिए कहना तो उसका फ़र्ज़ था ।
उसे याद है जब भी उसे कोई चीज खाने की पसंद नहीं आती तब माँ खाना खा रही हो तो भी  बीच में  ही खाना छोड़कर रसोई की तरफ जाती और उसका मनपसंद खाना बनाती । आज वह अपनी मां को वहीँ  छोड़कर विदेश में अपने परिवार के साथ रह रहा है । जल्दी  फोन भी नहीं करता क्योंकि एक ही प्रश्न पूछा जाता है, कब आ रहे हो बेटा?
उसे पता चला है कि उसके पिताजी की आँखों का ऑपरेशन होने वाला है । पहले भी कुछ महीनों पहले  जब उसके पिता के घुटनों का ऑपरेशन हुआ वह नहीं जा पाया था । यहाँ भी उसे नींद कहाँ आती थी! उसे याद है पिताजी किस प्रकार लेटकर उसे पावों से झूला झुलाते थे,
अब भी उसके पिताजी की आँखों का ऑपरेशन है और वह अपने परिवार के साथ विदेश में रह रहा है. सभी लोग यह समझते हैं कि उसे अपने माता – पिता की परवाह नहीं । पर मधुर जानता है क्यों ? कितना मजबूर है वह ! वह नहीं आ सकता । अभी हाल ही में तो  यहाँ आकर बसा  है । वहां पर खर्च बहुत है और विदेश से भारत आना इतना आसान थोड़े ही है । फिर वह कुछ सोच कर कुर्सी पर बैठ जाता है । उसके मन में यह बात आती है कि भारत  कितने दिन रहेगा ? दो  दिन या तीन  दिन, फिर से वापस वापस आना ही होगा और इतने दिनों का खर्च भी कितना हो जाएगा । कोई फायदा नहीं । उसे याद है उसके घर के पास एक भइया रहते हैं ,बहुत अच्छे हैं वह उसके  मां-बाप का तो पूरा ध्यान रख लेते हैं । उन्हीं को फोन कर दूँगा । वह सब संभाल लेंगे। अब चिंता नहीं ।
मधुर के माता- पिता मधुर की स्थिति को जानते हैं पर दिल तो आखिर दिल है ।
मधुर को क्या पता उसके माता पिता उस दो-तीन दिनों में भी कितनी खुश हो जाएँगे उनकी आँखे तरस गई है अपने पुत्र को, अपने बच्चे  को देखने के लिए । वह क्यों नहीं समझता है । उसकी अपने माता  पिता के  प्रति  जिम्मेदारियाँ भी है । क्या हुआ जो पैसे खर्च हो जाएँगे ! कम पैसों में उन लोगों ने किस तरह मधुर की परवरिश की । क्या उसे छोड़ दिया था उन्होंने? आज भी जब फोन की घंटी बजती है दोनों लपक कर उठाते हैं शायद मधुर का फोन हो । लेकिन नहीं , कभी दूकानदार का फोन होता है तो कभी नल की मरम्मत करने वाले का । मधुर का फोन आए तो अरसा बीत गया है ।
मधुर के पिताजी तो बस अपनी दुनिया में ही खो गए हैं, उन्हें सिर्फ अपनी चिंता है, ऑपरेशन कब होना है , कहाँ होना है कैसे जाना है , डॉक्टर से बात हुई क्या, दिन में कितनी ही बार पड़ोस में रह रहे रमेश को फोन कर डालते हैं । रमेश कई बार झुंझला जाता है पर फिर सोचता है , चलो कोई बात नहीं । वह नहीं  करेगा तो कौन करेगा । कोई उपाय भी तो नज़र नहीं आता ।
मधुर की माँ तो समय से पहले ही बूढ़ी  हो गयी है । जब से मधुर के पिताजी का घुटनों का ऑपरेशन हुआ है , उनका घर से निकलना ही बंद हो गया है। वे नीचे ही नहीं उतरती. सब्जी वाला, दूध वाला सब घर पर ही सामान दे जाते हैं , फोन करते ही हाजिर । बस मधुर ही नहीं हाजिर हो पाता । खाने पीने का भी क्या है , एक ही बार में दो बार का काम हो जाता है । वैसे तो कोई उनके घर जल्दी नहीं आता, आकर भी कोई क्या करेगा, फिर वही पुरानी बातें , वही प्रश्न मधुर का फोन आया , वह  आ रहा है क्या, कब तक आएगा । कब तक सच को झुठलाते रहेंगे, कब तक इन प्रश्नों को झेलते रहेंगे!!
कभी कभार जब कोई आता है तो फट से उस सामान की ओर बढ़ जातीं हैं जो कोई अपने साथ लाता है । जीभ का स्वाद कम नहीं हुआ है, पति तो डायबिटीज के मरीज़ है पर वह तो नहीं, उन्हें  तो खाने पीने का शौक है । पर समय से पहले ही जैसे किसी ने उन इच्छाओं को दबा दिया है । पर इच्छाएं कहाँ दबती है, जीभ तो किसी की भी सगी नहीं होती, तो उनकी भी नहीं ।
एक तरफ मधुर है जो विदेश चला तो गया है,  अपने माता- पिता से मिलने के लिए इतना खर्च उठा पाने में सक्षम  नहीं , अपने परिवार को देखे या अब पिछले सम्बंधोॱ को । दूसरी तरफ उसके पिता हैं, जो वास्तविकता से भली- भांति परिचित हैं , बेटे के  आने की उम्मीद छोड़ चुके हैं, भूलने की बीमारी में अपने बेटे की यादें भी शायद धुंधली हो रहीं हैं, और तीसरी ओर उसकी माँ है, जो रह- रह कर बातों ही बातों में कई बार मधुर का नाम ले लेती है, उन्हें  उसके आने की उम्मीद अभी भी है, आखिर माँ जो ठहरी!! माँ तो  माँ ही होती है । पैसे कमाने की धुन ने सबको अलग कर दिया है! आखिर कितना पैसा चाहिए आदमी को!!!
 लेखिका : उषा छाबड़ा

Monday, June 27, 2016


आजकल फेस बुक पुरानी तस्वीरों को सामने ला देता है , हमारी यादें ताज़ा करवाता है या यूँ कहें कि पुरानी कहानियों को तरोताजा कर देता है।
कहानी ---
जैसे ही माँ - पिताजी , दादी -दादा , नानी- नाना , चाचा- चाची या कोई भी व्यक्ति कहता है चलो एक कहानी सुनाते हैं , सब के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसा क्या है कहानी में !! कहानी में एक राजा हो या भिखारी, परी हो या शहज़ादी , सुर हो या असुर और ऐसे सजीव कोई न भी हो तो भी एक निर्जीव सी पेंसिल की भी एक कहानी बन जाती है। कहानी सबको एक अलग ही दुनिया में ले चलती है , कहानी का अपना अलग ही आनंद है। इसे सुनने का भी एक अलग मज़ा है। कहानी में हम कई बार किसी किरदार से ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे कि वह हमारा ही अक्स हो। उसे दुःख पहुँचता है तो हम दुखी होते हैं , वह खुश होता है तो हम भी खुश हो जाते हैं। कहानी में ही हम अपने जीवन के प्रश्नों का हल खोजने लगते हैं। कई बार कहानी हमें ऐसे कल्पना लोक में ले जाती है कि उसी में समय बिताने का मन करता है।
कहानी सुनाना भी एक कला है। कहानी सुनाते समय सबकी आँखें , सबके कान बस कहानी सुनाने वाले की तरफ ही लगे होते हैं। अगर सुनाने वाला ढंग से कहानी नहीं सुनाता तो कहानी टूटने लगती है। सब चिल्ला उठते हैं, "क्या हुआ भाई ? समझ नहीं आया!"
यह पूरा संसार कहानियों का ही तो पिटारा है। यहाँ हर पल एक नई कहानी बुनी जाती है!! कहानी सुनें और सुनाएँ।
उषा छाबड़ा
27.6.16

Sunday, June 26, 2016

                              गर्मी की छुट्टियाँ
गर्मी की छुट्टियाँ !! जिस प्रकार बच्चों को इसका इंतज़ार रहता है वैसे ही हम अध्यापकों एवं अध्यापिकाओं को भी रहता है भई, हम भी तो बच्चों के संग रहकर बच्चे  बन जाते हैं न !
तो लीजिए आ गई गर्मी की छुट्टियाँ  ! २१ तारीख से हम भी  लगे इस छुट्टी के मज़ेबच्चों की फरमाइशें , कुछ मियां जी कीं और फिर  अपनी तो थी हीं बस पहला सप्ताह तो जाने कहाँ उड़ गया पता ही नहीं चला
अगले सप्ताह भी कुछ घर  के काम निपटाने में निकल रहा था कि नज़र पड़ी एक निमंत्रण पर जो कि अभिनव बालमन के तीन दिवसीय कार्यशाला की थी, वो भी अलीगढ़ में निमंत्रण पत्र पर देखा कि कवि रावेंद्रकुमार रवि जी भी बच्चों को कविता सिखाने आने वाले हैं तो बस फिर क्या था चल पड़ी हमारी सवारी अलीगढ की ओर हमारे मियां जी ने राय दी, चलो आगरा भी हो लेंगे हमने भी एक पल की देरी नहीं की और जी सुबह गाडी में बैठ चल दिए यमुना एक्सप्रेस हाईवे  पर।  पहली बार सफ़र कर रहे थे उसपर पहले -पहले तो अच्छा लग रहा था पर हमारे साहब जी को यूँ सीधे -सीधे रास्ता नापने  में आनंद नहीं आ रहा था थोड़ी देर बाद जब अलीगढ के लिए हम एक्सप्रेस वे से अंदर की ओर मुड़ गए तो इनकी तो जैसे जान में जान आई मैंने इनकी तरफ देखा आनंद की तो सीमा ही नहीं थी मुझे इस आनंद  का कारण  समझ नहीं आया पूछने पर इन्होंने बताया कि इतने वर्षों बाद उत्तर प्रदेश की सड़क दिखाई दी है जिसमें दोनों तरफ लोग दिखाई  दे रहे हैं , उनकी बोली सुनाई दे रही है उनके खपरैल के मकान , कच्ची सड़कें जिसमें ढोर- डंगर दिखाई दे रहे हैं , आनंद तो इस प्रकार की सड़क पर गाडी चलाने में है , सीधे सीधे जहाँ रौनक ही नहीं वहां क्या मजामुझे समझ आया कि व्यक्ति चाहे अपने जन्म स्थल से चाहे कितनी ही दूर क्यों न रहे , चाहे कितनी ही आराम की जिन्दगी क्यों न जी रहा हो , एक बार अपने प्रदेश में जब पहुँचता है तो उस आनंद को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता
रस्ते में हम चाय पीने के लिए एक ढाबे पर रुके मैंने चाय पीते- पीते उस ढाबे वाले से यूँ ही पूछ लिया कि जी  कितने सालों से आप ये ढाबा चला रहे हैं   मेरा पूछना ही था कि सुंदर - सा जवाब आया बड़े गर्व  के साथ उसने कहा कि जी हमारा  ढाबा तो जी यहाँ का सबसे पुराना ढाबा है , बीस साल से भी ऊपर हो गए जी चलाते  कितना  आत्म - विश्वास, कितना सुख, उसके  इस उत्तर में मैं यहाँ उसे शायद लिख पाने में भी सक्षम महसूस नहीं कर रही जहाँ इतने वर्ष नौकरी करके , उससे अधिक शायद कमा कर भी , इस तरह का उत्तर मैं अपने लिए नहीं दे पाती थोड़ी कमाई में भी संतुष्टि उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी
चाय पीकर आगे रवाना हुए और पहुँच गए निश्चल जी एवं उनकी टीम द्वारा चलाई जा रही  कार्यशाला  में सभी  अपने काम में व्यस्त तरह - तरह की  कक्षाएँ  लगी हुई थीं और बच्चे सीख रहे थे हमारा अभिनन्दन हुआ , आवभगत हुई मंच पर स्थान मिला , बच्चों से संबोधन करने का मौका मिला किसे यह सब अच्छा नहीं लगेगा सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब रावेंद्रकुमार  रवि  जी से मुलाक़ात हुई और मैंने उनसे कविता लिखने का गुर सीखाज्ञान  तो जहाँ मिले  वहां  झट पहुँच जाना चाहिए।
फिर थोड़ी देर रुक कर हम आगरा की ओर रवाना हुए आगरा में बीना जी से मुलाकात हुईबीना जी के ngo  प्रयास के बारे में विस्तार से जाना शर्मा जी और बीना जी दोनों का व्यक्तित्व प्रभावी है और उनकी बातों से हम दोनों बहुत प्रेरित हुए
अगले दिन सुबह सुबह ताजमहल की सुन्दरता निहारने निकल पड़े सुबह ६.३० बजे सामने से ताजमहल को देखा जिसके पीछे सफेद बादलों का झुण्ड था इच्छा हुई कि बस यह  पूरा दृश्य आँखों में कैद कर लिया जाए कैमरा भला इसे कैसे समेट सकता था !
वहाँ  से निकलते समय एक छोटी सी बात हुई एक महिला अपने बच्चे को ताजमहल दिखाने लाई थी बच्चे को वह बताने का प्रयत्न कर रही थी - देखो बेटा, ताजमहल !! बच्चे ने सरसरी निगाह से देखा फिर कह  उठा,  माँ  ताज भवन ? माँ कुछ कहती कि तभी बच्चे को एक उछलती - कूदती गिलहरी दिख गई और वह बोल पड़ा,  माँ, गिलहरी ! माँ, गिलहरी !” वह उसके पीछे भागने लगा  मेरे मन में विचार आया कि बच्चे की रूचि जीते जागते उस नन्हे से जीव में है , उस पत्थर के ताजमहल में नहीं क्या ऐसा ही हम बच्चों की शिक्षा के साथ नहीं करते जो शिक्षा बच्चों को खुले आसमान के नीचे  मिलनी चाहिए  क्या उसे हम वह न देकर बंद कमरों में वह पढ़ाने की कोशिश नहीं करते जो वह पढ़ना ही नहीं चाहता
खैर  , हम बीना जी के ngo के बच्चों से मिलने चल दिए. उन्होंने इतना कुछ सीख रखा था जिसके बारे में सोच भी नहीं सकती थी बच्चों ने मुझे मेरी पुस्तक  'ताक  धिना  धिन ' से गीत सुनाये।
मेरी ख़ुशी का   ठिकाना  ही नहीं था। मैंने भी उन्हें कुछ कविताएँ और कहानियाँ  सुनाईं।
वहीँ से वापसी हुई और हम सब यादों को समेटते हुए दिल्ली लौटे जब गाड़ी में साँस लेना दूभर होने लगा था, तो यहाँ की प्रदूषित हवा महसूस होने लगी  सच बाहर से आने पर ज्यादा पता चलता है  यहाँ रहते हुए तो जैसे प्रदूषित हवा की आदत पड़  गई है
बाकी छुट्टियाँ  भी ऐसे ही कई  कहानियाँ  और कविताएँ  सुनाने में बीतीं।  कई  नए बच्चों से   दोस्ती  हुई उनकी चर्चा फिर कभी।


इतना अवश्य कहना  चाहूँगी  कि  जीवन का हर पल  हमें कुछ सिखा  जाता है। आवश्यकता है बच्चों की तरह जिज्ञासु बनने की, सिर्फ अपनी  इंद्रियों को सचेत  रखने की,   कुछ भी सीखने   के  लिए  हर  समय तत्पर  रहने की ।   
उषा छाबड़ा

26.6.16 

मित्रों
अपनी किताब 'ताक धिना धिन '  के  बारे में  पहले भी बता चुकी हूँ।  इस बार गर्मी की छुट्टियों में  कई बच्चों से मुलाकात हुई जो मेरी लिखी कविताएं  याद कर चुके थे। जब उन्होंने मेरे  सामने मेरे गीत सुनाए  तो मेरी खुशी का पारावार न रहा।  नीचे दिए लिंक पर अाप इन बच्चों को गीत गाते हुए  देख सकते हैं।  


https://www.youtube.com/watch?v=HPvkR6TUnBE
https://www.youtube.com/watch?v=1c4EogtaLF4
https://www.youtube.com/watch?v=G-1uUiukzS0

उषा छाबड़ा
26.6.16

Saturday, June 18, 2016

                     रंगमंच और बच्चे
जब से विद्यालय में मैंने पढ़ाना  शुरू किया तब से ही रंगमंच मेरे साथ जैसे जुड़ गया था बच्चों के साथ जब उन्हें कुछ  सिखाने का प्रयास करती तो स्वयं ही कुछ सीख जाती रंगमंच कितना प्रभावशाली माध्यम है अभिव्यक्ति का ! मैंने इसके द्वारा कितने बच्चों के व्यक्तित्व को बदलते हुए देखा है जो बच्चे पहले संकोची से होते हैं , धीरे -धीरे इससे जुड़ने के बाद खुलने लगते हैं, अपनी बात को सुंदर ढंग से बताने लगते हैं , दूसरों को समझने लगते हैं जो पहले अधिक हाथा-पाई करते हुए दिखाई पड़ते हैं,चंचल होते हैं,वे अनुशासन में रहना सीख जाते हैॱ ।
अभी हाल ही की बात है जिसमें मैं बच्चों को नुक्कड़ नाटक के लिए तैयारी करवा रही थी सबसे पहले तो बच्चों को खेल करवाए गए जिससे कि उनमें मनोरंजन के साथ सामूहिकता का भाव पैदा हुआ फिर धीरे - धीरे हमने एक विषय पर काम करना आरम्भ किया समूह में उन्होंने अपने अपने विचार रखे और फिर एक खाका तैयार होने लगा जिसे जो बात रखनी थी , उसे पूरा मौका दिया गया सबकी कल्पना और सृजनशीलता से एक नाटक बनकर तैयार हुआ अब आई उसे कार्यान्वित करने की बारी हर बच्चा आरम्भ में  अच्छा अभिनय नहीं करता ,लेकिन अंत तक आते -आते सब मिलजुलकर एक सुंदर नाटक प्रस्तुत कर लेते हैं ऐसा ही कुछ इस बार भी नाटक सिखाने के दौरान हुआ

इस नुक्कड़ नाटक में एक भाग ऐसा था जिसमें कि ताल और लय का ध्यान रखते हुए एक छोटा स नृत्य करना था एक बच्चा समूह में ताल मिलाकर अपने पाँव नहीं चला पा रहा था उसे यह बात पता चल रही था कि उसकी वजह से पूरे समूह का यह हिस्सा बिगड़ रहा था पर  यह उसके बस में नहीं था मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसने कभी नृत्य नहीं किया है इसलिए उसमें वह खुलकर ताल के साथ ठीक से नृत्य नहीं कर पा रहा मैं उसकी उस हीन भावना को निकालना चाह रही थी जो कि उसके मन में घर कर गयी  कि वह यह कभी ठीक से नृत्य नहीं कर सकता
मैंने उसी समूह से एक बच्चा बाहर निकाला उस बच्चे से दूसरे  बच्चे को सिखाने के लिए कहा मैं ओर वे दोनों बच्चे दूसरे कक्ष में चले गए पहले तो दोनों में झिझक थी लेकिन दोनों फिर सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में प्रवेश कर गए उस लड़के ने पाच मिनट में ही दूसरे बच्चे को उस नृत्य की ताल सिखा दी जैसे- जैसे वह बच्चा ठीक तरह से पाँव  चलाने लगा , उसके चेहरे के भाव बदलते गए अपने मित्र की सहायता से उसने यह काम बखूबी समझ लिया अब आई बारी सबके साथ करने की जैसे ही वह दृश्य आया , वह मेरी तरफ देखने लगा। वह घबरा रहा था कि पता नहीं वह सबके साथ कर पाएगा कि नहीं  मैंने मुस्कराते हुए उसकी आँखों में देखावह भी मुस्कुराया उसने अपने कदम चलाये, उसे अपने ऊपर विश्वास नहीं हुआ कि वह सबके साथ कदम से कदम मिलकर सुन्दरता से नृत्य कर पा रहा है वह पूरे समय मेरे और अपने मित्र की ओर देखता रहा उसके चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था उसकी प्रसन्नता देखते ही बनती थी हम तीनों एक ऐसी ख़ुशी साझा कर रहे थे जिसका पता समूह में और किसी को नहीं था
इस नाटक तैयार होने की पूरी प्रक्रिया में हर बच्चे के व्यक्तित्व  में बदलाव आया वे अपनी बात को स्पष्ट रूप में कहने के लिए सक्षम हो गए थे समूह में एक ताकत होती है, उन्होंने इस बात को कितनी सहजता से समझ लिया
अंत में मैं  यही कहना चाहूगी बच्चे को कभी भी इस हीन भावना से ग्रसित न होने दें कि यह काम तो तुम्हारे बस का  नहीं है अगर हम सब मिलकर धैर्यपूर्वक प्रयास करें तो सब कुछ संभव हो सकता है किसी के आत्मविश्वास को तोड़ना आसान है , बनाना मुश्किल है बच्चे अपने हमउम्र बच्चों से अधिक सीखते हैं अतः ऐसे उपाय निकालें जिससे बच्चे समूह में रहे, एक दूसरे से कुछ अच्छा सीखें रंगमंच एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो बच्चों को एक दूसरे के प्रति संवेदनशील भी  बनाता है । बच्चों को रंगमंच से जुड़ने के लिए प्रेरित करें ।
उषा छाबड़ा
१९.६.१६