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Monday, June 27, 2016


आजकल फेस बुक पुरानी तस्वीरों को सामने ला देता है , हमारी यादें ताज़ा करवाता है या यूँ कहें कि पुरानी कहानियों को तरोताजा कर देता है।
कहानी ---
जैसे ही माँ - पिताजी , दादी -दादा , नानी- नाना , चाचा- चाची या कोई भी व्यक्ति कहता है चलो एक कहानी सुनाते हैं , सब के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसा क्या है कहानी में !! कहानी में एक राजा हो या भिखारी, परी हो या शहज़ादी , सुर हो या असुर और ऐसे सजीव कोई न भी हो तो भी एक निर्जीव सी पेंसिल की भी एक कहानी बन जाती है। कहानी सबको एक अलग ही दुनिया में ले चलती है , कहानी का अपना अलग ही आनंद है। इसे सुनने का भी एक अलग मज़ा है। कहानी में हम कई बार किसी किरदार से ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे कि वह हमारा ही अक्स हो। उसे दुःख पहुँचता है तो हम दुखी होते हैं , वह खुश होता है तो हम भी खुश हो जाते हैं। कहानी में ही हम अपने जीवन के प्रश्नों का हल खोजने लगते हैं। कई बार कहानी हमें ऐसे कल्पना लोक में ले जाती है कि उसी में समय बिताने का मन करता है।
कहानी सुनाना भी एक कला है। कहानी सुनाते समय सबकी आँखें , सबके कान बस कहानी सुनाने वाले की तरफ ही लगे होते हैं। अगर सुनाने वाला ढंग से कहानी नहीं सुनाता तो कहानी टूटने लगती है। सब चिल्ला उठते हैं, "क्या हुआ भाई ? समझ नहीं आया!"
यह पूरा संसार कहानियों का ही तो पिटारा है। यहाँ हर पल एक नई कहानी बुनी जाती है!! कहानी सुनें और सुनाएँ।
उषा छाबड़ा
27.6.16

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