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Wednesday, February 24, 2016

अहसास
“हेलो , तुम्हें काम तो याद है ना,” मधुरिमा ने कहा. 
उधर फोन पर मुकेश की आवाज आई , “कौन - सा काम ?”
मधुरिमा ने कहा, “अरे! मैं कितने दिनों से कह रही हूँ पर तुम हो कि वह काम करते ही नहीं .आज शाम को जब मैं कार्यालय से घर पहुँचू तो मेरा काम हुआ होना चाहिए।”
“नहीं, नहीं, मुझसे नहीं होगा मधुरिमा!” मुकेश ने कहा.
“मैं कुछ सुनना नहीं चाहती. काम करके रखना.” यह कहकर मधुरिमा ने फ़ोन रख दिया.
शाम को जब मधुरिमा घर पहुँची तो उसने मुकेश से पूछा, “मेरा काम हुआ?”
“मुझे समय नहीं मिला, मधुरिमा ,” मुकेश ने कहा .
मधुरिमा ने कहा, “आज कोई बहाना नहीं चलेगा. आज तुमसे करवा कर ही रहूँगी.”
“अच्छा बाबा ठीक है. रात तक कर दूँगा.”मुकेश ने कहा .
इधर- उधर के काम निपटाते हुए समय बीत गया. रात के दस बज रहे थे . मुकेश ने एक कागज़ निकाला, उसे देखा , फिर अपनी जेब में रख लिया. अचानक मधुरिमा की निगाह उस कागज़ पर पड़ी.
“इसमें क्या है?” मधुरिमा ने पूछा.
“अरे! कुछ नहीं छोड़ो।“ मुकेश ने कहा.
“नहीं, नहीं, मुझे यह कागज दो.” मधुरिमा ने कहते हुए कागज उससे ले लिया . मधुरिमा ने उस कागज को देखा. मुस्कराकर फिर सोफे पर जाकर बैठ गई. उसमें लिखा था-
मधुरिमा , मैंने तुम्हें पहली झलक में ही पसंद कर लिया था. कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था क्योंकि तुम उस समय कालेज की पढ़ाई कर रही थी . कई बार मुलाकात भी हुई. तुम्हें तो पता ही है कि मैं तुमसे बात करने में कितना झिझकता था . पता नहीं फिर जाने कैसे मैं बिजी हो गया और तुम भी खो- सी गई. कभी- कभी संपर्क करने की कोशिश करने की इच्छा भी हुई, पर किसी कारण से मिलना नहीं हो पाया. चार साल बाद बाद न जाने कहाँ से कोई तुम्हारे लिए रिश्ता ले कर आया और मैं तो ख़ुशी से झूम उठा. मैंने तुरंत हामी भर दी और हमारी शादी हो गई. इस शादी को कितने वर्ष हो गए. मधुरिमा, बच्चों के होने के बाद तो बस हम दोनों का एक मात्र उद्देश्य उनकी अच्छी परवरिश ही रह गया था. हमारे बीच तो बस बच्चों ओर घर की बातें ही होती रहीं , पास रहकर भी हम किसी न किसी उलझन में फँसे रहे और जीवन की आपा- धापी में अजनबी से बन गए. तुमने किस प्रकार मेरे साथ इतने वर्ष बिता दिए, कुछ पता ही नहीं चला. हर कदम पर तुम मेरे साथ खड़ी रही. कई बार ऐसे मौके आए जब तुमने मुझे सहारा दिया. आज जब तुमने कहा कि मैं तुम्हें पत्र लिखूँ तो मुझे समझ नहीं आया मैं कहाँ से शुरू करूँ . इतनी बातें, इतनी ढेर बातें जो एक पति-पत्नी में हो जाती हैं , कहाँ से इस पत्र में समेट दूँ ! बस मैं यही कहना चाहता हूँ कि तुमने सुख और दुख की घड़ियों में मेरा सुंदर साथ निभाया , जब जब मैं टूटा, तुमने मुझे सहारा दिया.हम दोनों ने परिवार को अच्छे से मिल कर बनाया . ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम यूँ ही मिलकर जीवन के बाकी वर्ष बिताएँ .
तुम्हारा,
मुकेश
मधुरिमा पत्र पढ़ते-पढ़ते रोने लगी. उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे .मुकेश कभी मुँह से अपनी बात नहीं कहता था, लेकिन हर छोटी- बड़ी बातों में उसका प्यार झलक जाता था .आज सुबह ही वह मुकेश को यह काम बताकर आई थी और चाहती थी कि वह उसे पत्र लिखे.उसके काफी ज़िद करने पर मुकेश ने उसे यह पहला पत्र लिखा था.
तभी मुकेश भी उसके पास आकर बैठ गया और उसने प्यार से मधुरिमा को अपने पास खींच लिया। उसके स्पर्श का यह अहसास ही मधुरिमा को बीते वर्षों की सुखद याद दिलाने के लिए काफी था.
उषा छाबड़ा
२४.२.१६

Tuesday, February 23, 2016

मेरी आवाज़ में सुनिए कविता "बसंती हवा" . यह बसंती हवा की कहानी है .
Basanti Hawa
This is a poem By Renowned Hindi poet Late Sh. Kedarnath Agarwal .
SOUNDCLOUD.COM|BY USHACHHABRASTORYTELLER

Saturday, February 20, 2016

                                    एक कहानी
आज मैं स्कूल बस से जब अपने स्कूल की ओर जा रही थी तो पास ही कक्षा चार की एक  छात्रा बैठ गई  मैं एक किताब पढ़ रही थी जिसमें छोटी-छोटी कहानियाँ थी वह लड़की भी मेरी किताब में झाँकने लगी थोड़ी देर बाद उसने मुझसे पूछा,” मैम , क्या आप भी छोटी कहानियाँ पढ़ना पसंद करती हैं ?”
मैंने कहा,“हाँ , मुझे छोटी कहानियाँ पढ़ना अच्छा लगता है
उसने कहा, “मुझे भी छोटी कहानियाँ पसंद हैं
मैंने पूछा, “क्यों ?”
“मैम, कहानी बड़ी होने से बीच में छोड़ने का मन नहीं करता और फिर बहुत पढ़ाई भी करनी होती है, इसलिए ज्यादा समय नहीं निकाल पाती
फिर मैंने कहा, “अच्छा
“मैम, मैं आपको एक कहानी सुनाऊँ?” लड़की ने  पूछा
मैंने कहा, “सुनाओ” मैंने अपनी किताब बंद की और उसकी बात सुनने लगी  
उसने बताया कि उसकी मम्मी ने उसे एक किताब से यह कहानी सुनाई थी, जिसमें एक  शैतान अपने मालिक से कहता है कि मुझे काम नहीं दोगे तो मैं तुम्हें मार डालूँगा इसलिए फिर उसका मालिक एक सीढ़ी बनाता है जिसमें वह उस शैतान को यह काम दे देता है कि वह सीढ़ी से ऊपर नीचे - उतरे इस तरह वह आदमी उस शैतान को ऐसे काम में लगा देता है जो कभी ख़त्म नहीं होता और उसके चंगुल से  छूट जाता है
 बच्ची कहानी सुना कर कहने लगी, “ रात को सोते वक्त मैं भी सीढ़ी पर चढ़ने- उतरने की बात सोचती हूँ और मुझे अच्छी नींद आ जाती है
मैंने उससे पूछा, “यह तुम क्यों करती हो ?”
उसका जवाब था कि किताब में ऐसा लिखा था और उसकी मम्मी ने उसे समझाया था
उसकी बात  सुनकर अच्छा लगा मैं सोच में पड़ गई एक कहानी ने उसके मानस पटल पर इतना गहरा असर किया कि वह बचपन से ही ध्यान लगाना सीख गई अनजाने ही रात को सोने से पहले वह ध्यान करती है अगर अभिभावक बचपन से ही बच्चों को सुंदर कहानियाँ सुनाएँ , उनके साथ सही मायने में वक्त बिताएँ, तो बच्चे क्यों नहीं सुंदर फूल की तरह खिलेंगे !
उषा छाबड़ा

२०.२.१६ 

Tuesday, February 16, 2016

                                                             मुस्कान
शाम के सात  बज रहे थे । सुमित कॉलेज से लौटते समय मेट्रो स्टेशन पर उतरा और घर जाने के लिए रिक्शे की तलाश करने लगा । तभी पीछे से एक रिक्शे वाले ने आवाज लगाई , कहां जाना है भैया ? सुमित ने पीछे मुड़कर देखा । एक 25 - 30 साल का दुबला-- पतला युवक वहां खड़ा था । उसने सिर पर गमछा था लपेटा हुआ था । सुमित ने पूछा  - जनकपुरी चलोगे ? 
रिक्शे  वाले ने कहा  - जी साहब 
सुमित  ने पूछा  - कितने पैसे?
रिक्शे  वाले ने कहा - जी, 40  रुपये ।
सुमित आगे बढ़ गया । तभी रिक्शा वाले ने फिर से आवाज़ लगाई- कितना दोगे  साहब ?
मेरा तो रोज का आना जाना है । तीस रुपये दूँगा ।
रिक्शे वाले ने पहले कुछ सोचा और फिर कह  उठा -  चलिए, ले चलता हूँ । सुमित रिक्शे में बैठ गया
 रिक्शेवाला रिक्शा चलाने लगा । सुमित भी दिन भर की बातों के बारे में सोचने लगा । उसकी  गली के थोड़ा पहले रिक्शा जैसे ही मुड़ने  लगा , किसी  की आवाज ने उसे चौंका दिया । सड़क पर  खड़ा व्यक्ति रिक्शे वाले से कह रहा था – अरे! तुम्हारे  रिक्शे का पहिया बाहर क्यों निकल रहा है? जरा ध्यान से चलाओ । रिक्शे  वाले ने एक तरफ झुक कर देखा । हां, उसके पहिए की के नट बोल्ट कहीं पीछे खुल गए और इसलिए रिक्शे का पहिया  बार- बार बाहर निकल रहा था । अब रिक्शेवाला धीरे-धीरे रिक्शा चलाने लगा । बार-बार उसकी निगाह वहीँ  पहुंच जाती । सुमित भी  घबरा गया था । वह भी  बार-बार पहिए को देख रहा था । कहीं  पहिया बाहर आ गया तो ! यह  सोचकर  वह बहुत डर गया था । घर आने ही वाला था । रिक्शावाला मायूस -सा  दिख  रहा था । सुमित ने पूछा  -क्या बात है भैया? रिक्शे  वाले ने कहा - क्या बताऊँ  भैया! अब इसकी मरम्मत में भी पैसे लग जाएंगे । वैसे ही दो जून का खाना  मुश्किल से जुटा पाता हूँ , ऊपर से इतना खर्च.! सुमित ने कहा - ठीक तो कराना ही पड़ेगा  भैय्या ।
बातों ही बातों में सुमित का  घर आ गया । सुमित ने कहा - बस भैय्या , रोक देना । वह रिक्शे से उतरा ओर अपने पर्स में से उसने पैसे निकालकर  रिक्शे वाले को दे दिए , उसके कंधे को थपथपाया । आँखों ही आँखों में धन्यवाद कहा और घर की ओर बढ़ गया । रिक्शे  वाले ने पैसे गिने । चालीस रुपये थे ।

बात तो तीस रुपये की हुई थी और ये तो चालीस रुपये हैं । उसने सोचा गलती से दे दिए हैं  । वह वापिस करने के लिए सुमित को  आवाज़ लगाने ही वाला था लेकिन खर्च के बारे में सोचकर  चुप रह गया । वह मन ही मन खुश हो गया कि चलो कुछ तो आराम हो गया । वह यह सोच कर मुस्कुरा उठा   सुमित के चेहरे पर संतोष की झलक थी , उसने  रिक्शे वाले का थोड़ा बोझ जो हल्का कर दिया था । उसके होठों पर मुस्कान थी । जाने पूरे दिन की थकावट कहाँ छूमंतर हो गयी थी !
उषा छाबड़ा
१६.२.१६
इस कहानी को नीचे दिए लिंक पर सुन भी सकते हैं -