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Wednesday, November 25, 2015

छुट्टियाँ
स्कूल की आज से छुट्टियाँ हो रही हैं. स्कूल के बच्चे बेहद खुश हैं. आज से मस्ती के दिन जो शुरू होने जा रहे हैं. न कोई पढ़ाई , न सुबह उठने की मारामारी।
अध्यापिकाएँ भी खुश हैं. आज से परिवार के लिए कम से कम थोड़ा वक्त तो मिलेगा. कहीं घूमने का भी सोच रखा है. देखें शायद कोई मौका मिल जाये.
बाहर एक रिक्शेवाला बैठा है. वह प्रतिदिन तीन बच्चे लेकर स्कूल आता है और दोपहर को उन्हें घर वापिस भी छोड़ता है. कुछ अध्यापिकाएँ भी उसके रिक्शे से आतीं और जातीं हैं। बाहर बैठा वह सोच रहा है आज से घर का पूरा खर्च कैसे निकालूँगा । ओफ़ ये छुट्टियाँ क्यों होती हैं!!!!!!!!!!!!!!!!!!
उषा छाबड़ा
एक ओंकार।  ईश्वर एक है. सिर्फ इतना ही समझ लेना काफी है.  कोई द्वेष नहीं रहेगा।

Friday, November 13, 2015

      आज बाल दिवस है . इस उपलक्ष्य में एक छोटी सी कविता -
हम और हमारे सपने

चलो आज कुछ मज़े करें 
धमाचौकड़ी खूब करें।
गुब्बारे के बड़े यान से
अंतरिक्ष की सैर करें।
इन्द्रधनुष पर चढ़ जाएँ
चंदा से गपशप कर आएं।
पतंग पकड़ हवा में उड़ लें
परियों संग बर्फ में फिसलें ।
फूलों की सुगंध चुराएं
तितली बनकर उड़ जाएँ।
मछली बनकर नदी में उछलें
पेड़ों पर बैठ तारे गिन लें.
आज के दिन कोई रोक न हो
बस हम और हमारे सपने हों। 

उषा छाबड़ा
14.11.15

Wednesday, November 11, 2015

Monday, November 9, 2015

                                                         दीप जल उठे
आज दीपावली है. राजी पलंग पर बैठी खिड़की से बाहर देख रही है. आज बाहर कितनी रौनक है. सब कितने खुश दिखाई दे रहे हैं. कितने ही लोग परिवार समेत एक दूसरे से मिल रहे हैं. कुछ बच्चे एक तरफ मिलकर अपने घर के आगे दीये जला रहे हैं. कुछ लोग थाली में दीये जलाये मंदिर की ओर जा रहे हैं. थोड़ी दूर पर कुछ औरतें सजावट का सामान खरीद रही हैं. सब कितने उत्साहित हैं! वह एक गहरी सांस लेती है और अपने घर की ओर देखती है। अभी तक उसने कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई है. वह बुझे मन से पलंग से उठती है और रसोई की ओर बढ़ जाती है. उसके घर , उसके मन में कोई आनंद नहीं. उसके दोनों बच्चे परिवार समेत दूसरे शहर में रहते हैं. वह घर सजाएगी तो क्योंं ? फिर कुछ सोचकर एक दीया उठाती है. वह बाती के लिए हाथ बढ़ाती ही है कि तभी दरवाज़े की घंटी बज उठती है. उसके घर कौन आएगा ? वह मन ही मन सोचते हुए दरवाजे की ओर बढ़ती है. धीरे से दरवाज़ा खोलती है. अरे छुटकी तू यहाँ क्या कर रही है? जा अपनी सहेलियों के साथ घर को सजाओ। राजी कहती है.
छुटकी झट कह उठती है," वही तो करने हम सब आये हैं. हम सब सोच कर आये हैं कि आज आपका घर भी सजाएँगे। देखिये हम सब सजावट का सामान भी ले आये हैं. " उसकी सहेलियां भी धीरे से पीछे से निकल आईं. राजी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. इन छोटी बच्चियों ने उसे दीपावली के दिन कितनी ख़ुशी दी है। वह भी सब कुछ भूलकर उनके साथ घर सजाने में जुट गयी। उसके मन के दीप कितने सुन्दर जल उठे.
    उषा छाबड़ा
     8.11.15
   

Tuesday, November 3, 2015

राष्ट्रीय  संस्कृति महोत्सव २०१५  ( दिल्ली )

भारतीय संस्कृति की विशालता का अनुभव एक सुन्दर मेले में महसूस किया गया. चारों ओर जैसे उत्सव का माहौल थ. कितने लोग इस उत्सव में शामिल हो रहे हैं  कह पाना मुश्किल है, परन्तु यह सुन्दर अहसास ही काफी था कि मैं इस देश की नागरिक हूँ. ऐसा लगा कि मनुष्य चाहे कितना ही मोबाइल एवं टेक्नोलॉजी प्रेमी क्यों न हो जाए आज भी उसे अपनी आत्मा के स्वर को पहचानना आता है. वहां मौजूद हर व्यक्ति प्रसन्नचित्त दिखाई दे रहा था, अपनी उलझनों से परे , वैमनस्य से दूर।  अजीब सा सुकून , अनुपम दृश्य, आँखों  मेंअपने  देश की इतनी सुन्दर संस्कृति को समाने की नाकाम कोशिश. वाकई भारत अतुल्य है. सभी दिल्ली वालों  से आग्रह है कि  इस सुन्दर मेले में सपरिवार अवश्य जाएं. छोटे बच्चों को आप थोड़े ही समय में अपने देश के बारे में कितना कुछ बता सकते हैं. किताबी ज्ञान के परे , मेरा भारत !