Monday, November 9, 2015

                                                         दीप जल उठे
आज दीपावली है. राजी पलंग पर बैठी खिड़की से बाहर देख रही है. आज बाहर कितनी रौनक है. सब कितने खुश दिखाई दे रहे हैं. कितने ही लोग परिवार समेत एक दूसरे से मिल रहे हैं. कुछ बच्चे एक तरफ मिलकर अपने घर के आगे दीये जला रहे हैं. कुछ लोग थाली में दीये जलाये मंदिर की ओर जा रहे हैं. थोड़ी दूर पर कुछ औरतें सजावट का सामान खरीद रही हैं. सब कितने उत्साहित हैं! वह एक गहरी सांस लेती है और अपने घर की ओर देखती है। अभी तक उसने कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई है. वह बुझे मन से पलंग से उठती है और रसोई की ओर बढ़ जाती है. उसके घर , उसके मन में कोई आनंद नहीं. उसके दोनों बच्चे परिवार समेत दूसरे शहर में रहते हैं. वह घर सजाएगी तो क्योंं ? फिर कुछ सोचकर एक दीया उठाती है. वह बाती के लिए हाथ बढ़ाती ही है कि तभी दरवाज़े की घंटी बज उठती है. उसके घर कौन आएगा ? वह मन ही मन सोचते हुए दरवाजे की ओर बढ़ती है. धीरे से दरवाज़ा खोलती है. अरे छुटकी तू यहाँ क्या कर रही है? जा अपनी सहेलियों के साथ घर को सजाओ। राजी कहती है.
छुटकी झट कह उठती है," वही तो करने हम सब आये हैं. हम सब सोच कर आये हैं कि आज आपका घर भी सजाएँगे। देखिये हम सब सजावट का सामान भी ले आये हैं. " उसकी सहेलियां भी धीरे से पीछे से निकल आईं. राजी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. इन छोटी बच्चियों ने उसे दीपावली के दिन कितनी ख़ुशी दी है। वह भी सब कुछ भूलकर उनके साथ घर सजाने में जुट गयी। उसके मन के दीप कितने सुन्दर जल उठे.
    उषा छाबड़ा
     8.11.15
   

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