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| मेरे द्वारा लिखी गई कुछ किताबें |
Tuesday, January 26, 2016
Monday, January 25, 2016
स्वेटर
जनवरी में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । हमेशा की तरह
दोनों बहनों ने घंटी बजाई और काम करने के लिए घर के अंदर आ गयीं। बड़ी बहन पिंकी
बर्तन मांजने लग गयी और मीनू झाड़ू
लगाने के लिए अंदर कमरे में आ
गयी। मीनू अभी झाड़ू लगा ही रही थी कि
रसोई से खाँसने की आवाज़ आई। अंदर कमरे में बैठी रश्मि ने उसके खाँसने की आवाज सुनी और पूछ लिया , "अरे पिंकी, तुम इतनी खाँसी क्यों कर रही हो, क्या बात है?" " जी , कुछ नहीं वो कल से खाँसी हो रही है और थोड़ा सा बुखार भी
है." पिंकी ने जवाब दिया।
रश्मि ने कहा ," अरे पिंकी,
जब तबीयत ठीक नहीं है तो तुम क्यों आई हो ?
अब बुखार भी चढ़ा हुआ है। तुम वापस चले
जाओ।“ पिंकी ने कहा," नहीं, नहीं ,मैं घर नहीं जाऊँगी , घर पर मैं खाली
बैठ कर क्या करुँगी , अभी थोड़ा सा काम
कर के मैं चली जाऊँगी।" रश्मि ने पूछा ,"कोई दवाई वगैरह ली है क्या ?"
पिंकी बोली, "हांजी।" तभी मीनू बोल पड़ी ," वो एक जगह काम
करते हैं न हम, उन्होंने पीने के लिए सिरप दी है , वही पी है इसने.” तभी रश्मि ने देखा कि पिंकी
ने तो बस एक पतला- सा स्वेटर पहना है।“ रश्मि ने तेज स्वर में कहा, “पिंकी, क्या
तुम्हे गर्मी ज्यादा लगती है? इतना पतला सा स्वेटर पहन सुबह काम पर आई हो।“ मीनू
बोल पड़ी, " इसके पास तो यही स्वेटर है और मेरे पास भी।" अब तक रश्मि
की निगाह मीनू पर नहीं पड़ी थी। जब उसने उन दोनों को एक साथ देखा तो सन्न रह गई। इन
दोनों ने इतने पतले स्वेटर पहने हैं कि वो तो इस सर्दी में कुछ भी
नहीं हैं। हे भगवान , वह तो अचंभित रह गयी। कैसे प्रतिदिन ये दोनों लड़कियाँ घर से निकलती
होंगी , बुखार में भी यह स्वेटर पहन कर काम करने हिम्मत जुटा कर आती
होंगी। एक हम लोग हैं कितने स्वेटर अलमारी में होते हुए भी और खरीद कर अलमारी में
रख लेते हैं , इतने कपड़े ओढ़ कर
भी सर्दी का रोना रटते रहते हैं और कहाँ इतनी छोटी उम्र की लड़कियाँ कभी
मुँह से उफ़ नहीं निकालती। एक बार भी मुँह
से माँगा नहीं कि आंटी जी एक स्वेटर हो तो निकाल देना। घर में कपड़े धोने वाली तारा भी तो आती है , पर वह तो नहीं झिझकती। फिर ये दोनों कितनी छोटी हैं पर कभी
कुछ माँगा ही नहीं! रश्मि को याद आया ,कुछ
महीनों पहले इनके पिता की मृत्यु होने पर भी इनकी माँ
ने कभी सहायता के लिए कुछ नहीं माँगा , कभी भी पैसे बढ़ाने की बात नहीं की , कभी अपना दुःख नहीं
बताया , शायद माँ के ही संस्कार थे कि दोनों बेटियाँ कभी कुछ नहीं माँगती। रश्मि को जैसे थोड़ी देर बाद कुछ होश आया । वह अंदर कमरे में गयी। उसने अपने बेटे की जैकेट उसे दी जो अब उसके
बेटे को छोटी हो गयी थी। अपने सामने पिंकी
को पहनने के लिए कहा। पिंकी को वह पूरा आ
गया था। उसके चेहरे पर ख़ुशी देखकर रश्मि
को भी शांति हुई। पिंकी को देख मीनू भी खुश हो गयी। पिंकी ने काम निपटाया और चली गयी। मीनू जब काम ख़त्म करके जाने लगी तो रश्मि ने
उसे भी एक पुरानी जैकेट दी । मीनू भी खुश
हो गयी। रश्मि ने पूछा, “तुम्हे कैसा लगा
था, जब मैंने तुम्हारे सामने तुम्हारी बहन को जैकेट दी और तुम्हें नहीं ?” तो मीनू
ने कहा , “आंटी जी, मेरी बहन को बुखार था और में उसकी चिंता कर रही थी । जब आपने जैकेट दी तो मुझे उसके लिए बहुत अच्छा
लगा।” उसकी आँखों में भी ख़ुशी थी।
अपने जैकेट की चेंन बंद करे हुए
दरवाजे से निकलते वक्त उसने कहा,” थैंक यू ,आंटी जी।“
उषा छाबड़ा
Tuesday, January 12, 2016
उसके आने की तिथि का पता चलते ही इंतज़ार की घड़ियाँ आरम्भ हो जातीं। सबसे मिलने को दिल बेचैन हो जाता। यह पहली बार नहीं हो रहा था। इतने वर्ष बीत गए लेकिन हाल वैसा ही है। जब भी पुस्तक मेला और प्रगति मैदान की बात हो तो कैसे घर पर बैठा रहा जा सकता है! किताबों से मिले बिना कैसे रहा जा सकता है! पहले दोनों छोटे बच्चों को साथ ले , पति के साथ चल पड़ती थी। उन दोनों को कभी कोई किताब दिखाती तो कभी कोई। यह अच्छी है, इसे देखो,इसके चित्र कितने अच्छे हैं, बहकाते हुए, फुसलाते हुए उन्हें कुछ घंटे के लिए व्यस्त रखती।
आज बड़ा बेटा तो साथ नहीं गया था लेकिन छोटा बेटा किसी स्टाल में जो एक बार चला जाता तो निकलने का नाम नहीं ले रहा था। मैं इनकी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी, अच्छा लग रहा था कि उसे भी पुस्तकों से दोस्ती हो गयी थी. आज हम जब थक कर उसे बुला रहे थे तो कहता है मम्मी देखो न , अभी कितनी किताबों से तो मिले ही नहीं।
अपने बच्चों को आप सब भी बचपन से ही पुस्तकों से दोस्ती करवाएँ। , इस दुनिया का अपना ही आनंद है।
आज बड़ा बेटा तो साथ नहीं गया था लेकिन छोटा बेटा किसी स्टाल में जो एक बार चला जाता तो निकलने का नाम नहीं ले रहा था। मैं इनकी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी, अच्छा लग रहा था कि उसे भी पुस्तकों से दोस्ती हो गयी थी. आज हम जब थक कर उसे बुला रहे थे तो कहता है मम्मी देखो न , अभी कितनी किताबों से तो मिले ही नहीं।
अपने बच्चों को आप सब भी बचपन से ही पुस्तकों से दोस्ती करवाएँ। , इस दुनिया का अपना ही आनंद है।
Thursday, January 7, 2016
मुझे चाहिए वह किताब
मुझे चाहिए वह किताब ,
जिसमें हों प्रकृति के सुन्दर दृश्य,
जहाँ मैं कल्पना के घोड़ों पर बैठ दूर- दूर जा सकूँ ,
जो मेरे मन में प्रश्न उत्पन्न करे,
जहाँ ज्ञान हो,
विज्ञान हो,
आनंद हो,
समस्याएँ हों ,
समाधान हों ,
कहानियाँ जो परियों की हों ,
कहानियाँ जो वैज्ञानिकों की हों,
कहानियाँ जिनमें दादा- दादी हों ,
कहानियाँ जिनमें नाना- नानी हों ,
कहानियाँ जो रिश्तों की हों ,मित्रों की हों ,
कहानियाँ जो मेरी दुनिया की हों ,
जहाँ कंप्यूटर और इंटरनेट की बातें हों ,
मोबाइल हों , आई पैड हो , रॉकेट हों,
तो साइकिल हों , फूल हों , पौधे हों, पक्षी भी हों ,
ऐसी किताब जो मेरी दुनिया को जाने ,
ऐसी किताब जो मुझे समझे।
जिसमें हों प्रकृति के सुन्दर दृश्य,
जहाँ मैं कल्पना के घोड़ों पर बैठ दूर- दूर जा सकूँ ,
जो मेरे मन में प्रश्न उत्पन्न करे,
जहाँ ज्ञान हो,
विज्ञान हो,
आनंद हो,
समस्याएँ हों ,
समाधान हों ,
कहानियाँ जो परियों की हों ,
कहानियाँ जो वैज्ञानिकों की हों,
कहानियाँ जिनमें दादा- दादी हों ,
कहानियाँ जिनमें नाना- नानी हों ,
कहानियाँ जो रिश्तों की हों ,मित्रों की हों ,
कहानियाँ जो मेरी दुनिया की हों ,
जहाँ कंप्यूटर और इंटरनेट की बातें हों ,
मोबाइल हों , आई पैड हो , रॉकेट हों,
तो साइकिल हों , फूल हों , पौधे हों, पक्षी भी हों ,
ऐसी किताब जो मेरी दुनिया को जाने ,
ऐसी किताब जो मुझे समझे।
Wednesday, January 6, 2016
मुझे कई साल हो गए अपने विद्यालय के बच्चों को पढ़ाते हुए। बच्चों के बीच बच्चा बन जाना , उनसे बातें करना, उनके बारे में जानना, पुस्तकालय से कई बार किताबें ला- लाकर दिखाना , कई बार अपनी लिखी कहानियों , कविताओं की चर्चा करना , पढ़ाने के साथ साथ बाहरी जगत से अवगत कराना आदि। उन्हीं बच्चों के साथ का मेरा संसार । इतने वर्षों का सफ़र , मेरा अनुभव।
नव वर्ष के शुरूआती दिनों में ही मुझे कुछ नया अनुभव प्राप्त हुआ। मेरा मिलना ' बालसहयोग' एवं 'साक्षी' जैसी संस्थाओं के बच्चों से हुआ। अपने द्वारा लिखी गई कविता की पुस्तकें' ताक धिना धिन' जब इन बच्चों के बीच बाँटी तो मन जाने कहाँ उड़ चला। छोटे- छोटे बच्चे जिस प्रकार इन पुस्तकों को पाने के लिए लालायित थे, पढ़ने का प्रयास कर रहे थे , वह देखने लायक था। कितने उत्साह के साथ इन्होंने उन कविताओं को पढ़ा , उसे आप संलग्न चित्रों में देख सकते हैं। इनमें से कई बच्चों ने तो हाथों हाथ इनके चित्र बना के दिखा दिए। ये संस्थाएँ इन बच्चों के लिए कितना कुछ कर रही हैं, जानकर मन को बहुत अच्छा लगा। मैंने पाया कि सारे बच्चे एक समान ही होते हैं। सबमें कोई न कोई गुण है। आवश्यकता है सही समय पर इन्हें पहचानने की, उनके मार्गदर्शन की। ' बालसहयोग' एवं 'साक्षी' द्वारा उठाये गए कदम वाकई कई जिंदगियों को रोशन कर रहे हैं। जानती थी कि ऐसी कई संस्थाएँ समाजसेवा के काम में संलग्न हैं, लेकिन आज इन्हें करीब से देखने का मौका मिला। मन प्रफुल्लित हो उठा।
नव वर्ष के शुरूआती दिनों में ही मुझे कुछ नया अनुभव प्राप्त हुआ। मेरा मिलना ' बालसहयोग' एवं 'साक्षी' जैसी संस्थाओं के बच्चों से हुआ। अपने द्वारा लिखी गई कविता की पुस्तकें' ताक धिना धिन' जब इन बच्चों के बीच बाँटी तो मन जाने कहाँ उड़ चला। छोटे- छोटे बच्चे जिस प्रकार इन पुस्तकों को पाने के लिए लालायित थे, पढ़ने का प्रयास कर रहे थे , वह देखने लायक था। कितने उत्साह के साथ इन्होंने उन कविताओं को पढ़ा , उसे आप संलग्न चित्रों में देख सकते हैं। इनमें से कई बच्चों ने तो हाथों हाथ इनके चित्र बना के दिखा दिए। ये संस्थाएँ इन बच्चों के लिए कितना कुछ कर रही हैं, जानकर मन को बहुत अच्छा लगा। मैंने पाया कि सारे बच्चे एक समान ही होते हैं। सबमें कोई न कोई गुण है। आवश्यकता है सही समय पर इन्हें पहचानने की, उनके मार्गदर्शन की। ' बालसहयोग' एवं 'साक्षी' द्वारा उठाये गए कदम वाकई कई जिंदगियों को रोशन कर रहे हैं। जानती थी कि ऐसी कई संस्थाएँ समाजसेवा के काम में संलग्न हैं, लेकिन आज इन्हें करीब से देखने का मौका मिला। मन प्रफुल्लित हो उठा।
Thursday, December 31, 2015
आज .....
जब राकेश घर से निकला
पीछे से मुन्नी बोली,
पिताजी , आज मेट्रो से ऑफिस चले जाओ न ।
आज .....
जब रानी घर से बाजार के लिए निकली
मोनू ने आवाज़ लगाई
दादी, थैला घर से ही ले जाओ न ।
जब राकेश घर से निकला
पीछे से मुन्नी बोली,
पिताजी , आज मेट्रो से ऑफिस चले जाओ न ।
आज .....
जब रानी घर से बाजार के लिए निकली
मोनू ने आवाज़ लगाई
दादी, थैला घर से ही ले जाओ न ।
आज .....
जब रोहित पेड़ की तरफ बढ़ा
पास के मकान से आवाज़ आई
अंकल , पेड़ को मत काटो न ।
जब रोहित पेड़ की तरफ बढ़ा
पास के मकान से आवाज़ आई
अंकल , पेड़ को मत काटो न ।
आज .....
जब गौरी ने पटाखों के लिए ज़िद की
पास खड़े आदि ने कहा,
बहन , बहुत हुआ धुआँ बस करो न ।
जब गौरी ने पटाखों के लिए ज़िद की
पास खड़े आदि ने कहा,
बहन , बहुत हुआ धुआँ बस करो न ।
आज .....
जब मैं रात को घर से टहलने के लिए निकला
मंटू ने पीछे से आवाज़ लगाई
दादाजी , छिलके वाली मूंगफली घर आ कर ही खाओ न ।
आज .....
जहाँ बच्चों ने आगे की पतवार थाम ली है
मन आश्वस्त है,
ज़िम्मेदार बच्चे हमारी तरह भूल नहीं करेंगे
हमने तो अंजाम देख ही लिया है,
यह बच्चे अब और बर्बादी नहीं सहेंगे.
विकास की दौड़ में हम जो नुकसान कर बैठे
बच्चे उसे वहीँ से नई दिशा देंगे.
हमारी गलतियों को अपने ज्ञान से सँवारेंगे,
हाँ , सुनहरा सवेरा होने को है
नए वर्ष में उम्मीद की नई किरण जगी तो है.
उषा छाबड़ा
जब मैं रात को घर से टहलने के लिए निकला
मंटू ने पीछे से आवाज़ लगाई
दादाजी , छिलके वाली मूंगफली घर आ कर ही खाओ न ।
आज .....
जहाँ बच्चों ने आगे की पतवार थाम ली है
मन आश्वस्त है,
ज़िम्मेदार बच्चे हमारी तरह भूल नहीं करेंगे
हमने तो अंजाम देख ही लिया है,
यह बच्चे अब और बर्बादी नहीं सहेंगे.
विकास की दौड़ में हम जो नुकसान कर बैठे
बच्चे उसे वहीँ से नई दिशा देंगे.
हमारी गलतियों को अपने ज्ञान से सँवारेंगे,
हाँ , सुनहरा सवेरा होने को है
नए वर्ष में उम्मीद की नई किरण जगी तो है.
उषा छाबड़ा
नया वर्ष , अपनी गठरी में क्या लेकर आएगा? सभी के मन में यह प्रश्न बार - बार आता है।
नए साल में फिर से हम सब नई स्फूर्ति, नई उमंग, नए जोश ,नए संकल्प से भर जाते हैँ। बीती बातों को भुला, फिर से नए तार जोड़ते हुए नए जीवन की ओर बढ़ चलते है। ऐसा भी क्या नया हो जाता है? एक रात में क्या सब कुछ बदल जाता है? यह तो बस मन की बात है। वास्तव में हम एक साल के कुछ अनुभव और समेट लेते हैं, और परिपक्व हो जाते हैं ,जो गलतियाँ की उनसे कुछ सीख लेते हैं, निराशा हाथ लगी तो आने वाले दिनों की ओऱ उम्मीद से ताकते हैं।सब कुछ ठीक जाएगा , इसी सोच से फिर आगे बढ़ने की हिम्मत जुटाते हैं।
उम्मीदों और आशाओं से भरकर आइये इस नए वर्ष का जोरदार स्वागत करें , कुछ नया सीखें, कुछ नए मित्र बनाएँ , कुछ और सृजन करें, अपनी मुस्कान से कुछ और दीप जलाएँ। ख़ुशियाँ बाँटें और बटोरें।
उषा छाबड़ा
नए साल में फिर से हम सब नई स्फूर्ति, नई उमंग, नए जोश ,नए संकल्प से भर जाते हैँ। बीती बातों को भुला, फिर से नए तार जोड़ते हुए नए जीवन की ओर बढ़ चलते है। ऐसा भी क्या नया हो जाता है? एक रात में क्या सब कुछ बदल जाता है? यह तो बस मन की बात है। वास्तव में हम एक साल के कुछ अनुभव और समेट लेते हैं, और परिपक्व हो जाते हैं ,जो गलतियाँ की उनसे कुछ सीख लेते हैं, निराशा हाथ लगी तो आने वाले दिनों की ओऱ उम्मीद से ताकते हैं।सब कुछ ठीक जाएगा , इसी सोच से फिर आगे बढ़ने की हिम्मत जुटाते हैं।
उम्मीदों और आशाओं से भरकर आइये इस नए वर्ष का जोरदार स्वागत करें , कुछ नया सीखें, कुछ नए मित्र बनाएँ , कुछ और सृजन करें, अपनी मुस्कान से कुछ और दीप जलाएँ। ख़ुशियाँ बाँटें और बटोरें।
उषा छाबड़ा
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