Thursday, April 7, 2016
Tuesday, March 29, 2016
एक नई कहानी
अपनी किताब को बच्चों को देते हुए जो आनंद की अनुभूति होती है उसका शब्दों में बयान करना कठिन है।
बच्चों के मुस्कराते चेहरों को देख, उनकी आँखों की चमक को देख जो सुखद अहसास होताहै वह अपने आप में अनूठा है।
बात कल की है। कल का दिन कुछ ख़ास था। मुलाकात हुई PALNA और KIDSCAN के बच्चों से।
PALNA एक बाल कल्याणकारी संस्था है । यहाँ आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के नन्हें बच्चों को बड़े प्यार से शिक्षा दी जाती है। इनमें से कई बच्चे अनाथ भी हैं । इन बच्चों के बीच जाकर तो आप भी बच्चे बन जाते हैं । एक साथ ही good morning, good afternoon , good night हो जाती है और आप अनायास ही मुस्करा उठते हैं। जब ये बच्चे लपककर आपकी किताब को पकड़ते हैं तो बस आप किसी जहां में पहुँच जाते हैं ।
२९.३.१६
Friday, March 25, 2016
'ताक धिना धिन' मेरे द्वारा लिखे गए बाल गीतों की दो पुस्तकें हैं जिनकी समीक्षा आप नीचे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं . इन पुस्तकों में audio cd संलग्न है जिनमें इन गीतों को संगीतबद्ध किया गया है.
http://brandedgupshup.com/en/Tak-Dhina-Dhin/
Children are those innocent souls who grow up the way they are moulded. Right education and right learning is very important for them because what they learn during the early stages of their lives, they carry it with them their entire lives. Read the review athttp://brandedgupshup.com/en/Tak-Dhina-Dhin/
26.3.16
Wednesday, March 23, 2016
होली
टोली ने आवाज़ लगाई
चिंकी तो झट दौड़ी आई ,
पिचकारी को लिए हाथ में
चिंकू ने भी धूम मचाई,
रंग बिरंगे दोनों बच्चे
मित्रों की टोली में झूमे ,
कोई लाल था कोई पीला
पिंटू तो था रंगबिरंगा,
राजू जाने कैसे छूटा !!
छप्प ! एक गुब्बारा फूटा !
पिचकारी ने छोड़ी धार
भीग गए राजू सरदार।
होली ने सबको मिलवाया
यह त्यौहार सभी को भाया।
उषा छाबड़ा
२३.३. १६
टोली ने आवाज़ लगाई
चिंकी तो झट दौड़ी आई ,
पिचकारी को लिए हाथ में
चिंकू ने भी धूम मचाई,
रंग बिरंगे दोनों बच्चे
मित्रों की टोली में झूमे ,
कोई लाल था कोई पीला
पिंटू तो था रंगबिरंगा,
राजू जाने कैसे छूटा !!
छप्प ! एक गुब्बारा फूटा !
पिचकारी ने छोड़ी धार
भीग गए राजू सरदार।
होली ने सबको मिलवाया
यह त्यौहार सभी को भाया।
उषा छाबड़ा
२३.३. १६
Monday, March 21, 2016
World Poetry Day
सफ़र
अ – आ-- से होते हुए
क—ल—ज-- ट --से --ज्ञ तक
के अक्षरों में ही सिमट जाते हैं मेरे भाव
जाने कब ये अक्षर
भावनाओं के संग अठखेलियाँ कर
शब्दों की ओढ़नी पहन
कविता में बदल जाते हैं --
जाने क्यों
ये शब्द इतने बेचैन क्यों हो उठते हैं
कविता छटपटाती है
आतुर पागल कविता --
कलम कागज का साथ पा
बस बह चलती है कविता ---
सफ़र पूरा होते ही
सब शांत हो जाता है
उठती लहरें जैसे तट पर आकर
खामोश हो जाती हैं .
उषा छाबड़ा
२१.३.१६
Saturday, March 19, 2016
सम्भावनाएँ
अभी हाल ही में
मेरी मुलाकात ‘चेतना’ नामक गैर सरकारी संस्था के बच्चों से हुई। ये बच्चे अधिकतर
सड़कों पर रहते हैं। ये
कूड़ा बीनने का काम करते हैं ,
पुरानी बोतलें उठाते हैं ,कई बच्चे कारें धोने का काम भी करते
हैं। इनमें से आज दो बच्चों की कहानियों आपके
सामने रख रही हूँ ।ये कहानियाँ आपको
अधूरी लगेंगीं , अधूरी इसलिए कि उन्होंने अपने जीवन का सफ़र अभी तय
करना है।
पहला बच्चे की
कहानी कुछ इस प्रकार है - वह बच्चा इस
संस्था के संपर्क में बचपन में ही आ गया था। आज वह बच्चा
पढ़ाई का बेसिक कोर्स कर रहा है और
पाँचवीं कक्षा में है। उस बच्चे की आँखों
में पढ़ाई के प्रति आकर्षण देखते ही बनता है।
वह भविष्य में सेना में भर्ती होना चाहता है । मैंने उसके पास बैठकर उसकी लगन
को महसूस किया और लगता नहीं
कि वह दिन दूर होगा जब वह अपनी मंजिल पा लेगा।
दूसरी कहानी है
एक ऐसे बच्चे के बारे में जो बचपन में
अपने पिता के साथ एक होटल में काम करता था।
इसके पिता आज भी एक होटल में तंदूर में रोटी लगाने का कार्य कर रहे हैं। जब यह
छोटा - सा था ,तब चेतना संस्था
के संपर्क में आया। वह बर्तन मांजकर थोड़ी देर के लिए उनके संपर्क स्थान पर जाता , उनसे पढ़ता। आज यह बच्चा बड़ा हो चुका है ,दसवीं में ओपन स्कूल से पढ़ाई कर रहा है। यह 'बालकनामा' समाचार पत्र
का रिपोर्टर है। इसे संस्था की ओर से कैमरा भी
दिया गया है। वह सड़क पर रह
रहे बच्चों से मिलता है, उनकी समस्याओं को सुनता है वह अपनी कॉपी में
इनके बारे में लिखता है , उन बच्चों के समाचार इकठ्ठा करता है और इन
बच्चों की बातें अपनी अखबार में रिपोर्ट
करता है. वह कंप्यूटर का बेसिक कोर्स कर
रहा है। उसे टाइप करना भी आ गया है। यह शाम को बच्चों की फ्री ट्यूशन भी लेता है। उसके चेहरे पर हँसी और मुस्कान रहती है और आँखों में कुछ कर दिखाने
की चाहत दिखाई देती है।
ये कहानियाँ संभावनाओं से परिपूर्ण हैं। कुछ समय और बीतने
पर इनका जीवन अवश्य ही सुंदर आकार ले
लेगा। ऐसे अनेक बच्चे हैं जो सड़कों पर रहते हैं। उनकी कहानियाँ भी अधूरी है और यह चेतना संस्था उनके सपनों को साकार करने की कोशिश में जुटी हुई
है। कई बच्चे ऐसे भी हैं जिनके सपनों को पंख मिल चुके हैं एवं वे ऊँची उड़ान भर रहे
हैं।
अंत में यही कहना
चाहूँगी कि हम सम्पन्नता का जीवन जी रहे हैं फिर भी शिकायतों की गठरी ढोते रहते हैं।
इन बच्चों से मिलिए- ये अभावों में
जी रहे हैं पर सुनहरे ख्वाबों को नहीं छोड़ रहे, ज़िन्दगी से इन्हें
काफी उम्मीदें हैं. आइए इन गौरैयों को बचाने का प्रयास करें, इनके पंखों को कौशल की शक्ति मिले जिससे ये भी
ऊँची उड़ान भर पाएँ।
उषा छाबड़ा
Thursday, March 10, 2016
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