Monday, October 31, 2016

कहानी ' इंतज़ार '


Setu Bilingual सेतु  -  पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित द्वैभाषिक पत्रिका *  में छपी मेरी कहानी ' इंतज़ार ' 

Sunday, October 30, 2016


इंतज़ार (कहानी)

 - उषा छाबड़ा

रानी अपने घर में सोफे पर बैठी सोचे चली जा रही थी। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। बार-बार उसे राकेश की याद आ रही थी। राकेश जो कुछ वर्षों पहले ही विदेश चला गया था। शुरु-शुरु में तो उसकी कुछ ई मेल आईं थीं पर अब उससे संपर्क टूट चुका है। राकेश से वह बहुत नाराज़ थी।दो महीने से उसका कोई अता-पता नहीं। जाने वह कहाँ है, कैसा है ! वहाँ बैठे-बैठे वह अपने ख्यालों में खो गई।
राकेश के साथ समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ जाता था। ऑफिस से उसके साथ ही निकलना और फिर उसके साथ घूमने निकल जाना। कभी किसी फिल्म को देखने, तो कभी अपने घर का कोई सामान खरीदने। कितनी ही मुलाकातें उसकी आँखों के सामने से निकल रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसके बिना अपना खाली वक्त कैसे बिताये!

जब से राकेश विदेश गया था, शाम को वह सीधा घर ही आती थी। घर क्या, बस चारदीवारी से घिरे दो कमरे! सिर्फ सन्नाटा और कुछ नहीं! घर की ओर देखने का मन ही नहीं करता था। उसकी जिंदगी अधूरी सी हो गई थी। थोड़ी बहुत सफाई की, कुछ बनाया, बुझे मन से खाया, किसी किताब के पन्ने पलटे, बस धीरे- धीरे आँखें बोझिल हुईं और नींद आ गई। कई बार तो आधी रात में ही नींद टूट जाती और फिर आने का नाम ही नहीं लेती। फिर राकेश को ई मेल लिखने बैठ जाती जिनका जवाब आने की उम्मीद भी अब शायद ख़त्म हो रही थी। था तो केवल इंतज़ार!

आज बाहर बहुत गर्मी बहुत पड़ रही थी। रविवार का दिन था। ऑफिस में भी तो छुट्टी थी। बहुत दिनों बाद घर की ओर ध्यान गया था उसका ! जगह जगह मकड़ी के जाले झूल रहे थे और उसे जैसे कभी दिखाई ही नहीं दिए थे। सुबह से वह घर की सफाई में लगी हुई थी। दोपहर तक तो थक कर चूर हो चुकी थी।

अभी- अभी वह सोकर उठी ही थी और खिड़की के पास आकर बैठ गई। उसने पर्दा हटाया और खिड़की से बाहर झाँका। शाम हो रही थी। बाहर देखा तो आसमान पर काले बादल एक ओर से घिर रहे हैं। बादलों के साए में सूरज ऐसे छिप रहा है जैसे कि वह राकेश के आगोश में चुपचाप छिप जा जाती थी। न चाहते हुए भी राकेश को वह अपनी यादों से जुदा नहीं कर पा रही थी।. वही तो था जिसने इस अनजान शहर में उसे सहारा दिया था। इस नए शहर में वह अकेली, नौकरी की खातिर आई थी। वह तो किसी को भी नहीं जानती थी। राकेश ने ही तो उसकी सूनी जिंदगी में रंग बिखेरे थे।

वह अब आँगन में आकर खड़ी हो गई थी। दूर पेड़ पर बैठी चिड़िया भी बार - बार अपने घोंसले से बाहर आ जा रही थी जैसे कि उसे भी बारिश का इंतज़ार हो। झुलसती गर्मी में वह भी बेहाल सी जान पड़ रही थी। देखते ही देखते ठंडी सी बयार चल पड़ी। पेड़ों की पत्तियाँ जैसे हवा के संग अठखेलियाँ कर रहीं थीं।
ऊपर काले बादल अलग-अलग आकार लिए उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे जैसे कि किसी अतिथि के आने का सन्देश दे रहे थे। सारे पेड़-पौधे भी इस सन्देश को सुन झूम पड़े थे।

सिर्फ पेड़-पौधे ही क्यों, क्या मनुष्य नहीं! नीचे चलते हुए लोग जिनके चेहरे पर कुछ समय पहले चिंता की लकीरें थीं, प्यास बुझाने के लिए जहाँ पानी बटोरने की जद्दोजहद में पड़े थे , वे भी बारिश के आगमन की ख़ुशी को अपने चेहरे से छिपा नहीं पा रहे थे। एक बार ऊपर देखते , प्रसन्न हो फिर आगे की ओर बढ़ जाते। टप! पहली बूँद गिरी , जिसे प्यासी धरती ने सोखने में एक पल भी नहीं लगाया, बूँद पूरी तह गायब हो गई। फिर, टप – टप- टप---- और जैसे कि किसी नृत्यांगना के पायल की झंकार सबको मदमस्त करने लगी हो।

नन्हीं बूँदे धरती की प्यास बुझा रही थी। रानी मौसम के बदलाव से मन में बदलाव महसूस कर रही थी। जैसे ही कुछ बूँदें उसके चेहरे पर पड़ी, उसे राकेश से मिलने का वह दिन याद आ गया जब ऑफिस के बाहर यूँ ही खड़ी थी और बारिश हो रही थी। राकेश भी उसके ऑफिस में ही काम करता था और उसके पास आकर उसने अपनी गाड़ी रोकी थी। राकेश ने ही उसे तेज बारिश में घर पर छोड़ा था। बारिश में राकेश के साथ हुई पहली मुलाकात कितनी हसीन थी। मन में कुछ न होते हुए भी पता नहीं क्या था जो कि बार-बार दस्तक दे रहा था।
बारिश अब तेज हो रही थी और कितना अच्छा लग रहा था रानी को ! आँगन में जैसे बारिश की बूंदें बेतहाशा गिर रही थीं जैसे कि कह रही हों कि लो तुम्हारा इंतज़ार ख़त्म हुआ ! नीचे सड़क पर धरती तृप्त होती दिखाई दे रही थी। आस-पास पत्तों पर बारिश की बूँदे गिर रही थी। नीचे देखा, जो लोग सड़कों पर थे, वे इकट्ठे होकर पेड़ों के नीचे खड़े हो रहे थे। सभी को घर पहुँचने की बेताबी थी, पर फिर भी भीगते हुए भी उस वर्षा का आनंद ले रहे थे।
तभी रानी ने देखा, दूर एक झोंपड़ी दिखाई दे रही थी, टूटी–फूटी सी! उसका छज्जा अंदर की ओर शायद चू रहा था। एक औरत कभी एक बर्तन लेकर किसी छेद के नीचे रखती तो कभी कोई बाल्टी लेकर अपने घर के किसी एक कोने की ओर भागती। कभी कोई सामान गीला होने से बचाती तो कभी कोई। चेहरे पर सिर्फ शिकन था , कैसे बचा पाएगी वह अपने इस टूटे- फूटे आशियाने को! बाहर जहाँ सब लोग वर्षा का आनंद ले रहे थे, वहीँ इस औरत के लिए ये बारिश की बूँदें चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर रही थीं।

उसका बच्चा इन सब बातों से बेखबर, अपने घर के बाहर खड़ा था। दीन - दुनिया से दूर, अपनी ही धुन में बारिश की टपकती बूँदों से तरह तरह बारिश की बूँदों से खेल रहा था। एक बूँद जैसे ही टपकती उसे अपनी उँगलियों से छिटका देता, अपने चेहरे पर पड़ती नन्हीं बूँदों को पोंछते जाता , खिलखिलाता हुआ हँसता । उसे कितना आनंद आ रहा था ! उसके चेहरे पर कितनी खुशी थी ! उसे सिर्फ अपना खेल समझ आ रहा था, बस खेल !

रानी भी उसे देखकर खिलखिला पड़ी। अपनी बातों को तो जैसे वह भूल ही गई। राकेश के प्रति उसके मन में जो मैल था, वह भी बारिश में धुल गया था। आगे बढ़ने का नाम है ज़िन्दगी ! आज धरती में सोए कितने ही बीज जाग उठेंगे। परिस्थितियां जैसी भी हों, वे उगेंगे। चाहे तो पल- पल को बोझ समझ कर बिता दो या जीवन के पलों को आनंद से जी लो।

उसे भी राकेश को भूलना ही होगा! बारिश ने आज उसे नई राह दिखा दी थी। राकेश का इंतज़ार ख़त्म हुआ। वह अपने कमरे में मुस्कराते हुए चली गई और बड़े ही चाव से अपना कमरा ठीक करने लगी।

Wednesday, October 26, 2016

दीवाली

दीवाली 
दीवाली नजदीक आ रही है। एक बार फिर हम सब इस त्योहार को ख़ुशी- ख़ुशी मनाएँगे। 
स्कूलों में फिर से पटाखों के बिना दीवाली मनाने की बात पर ज़ोर दिया गया है। उन्हें वीडियो दिखाए गए , प्रार्थना सभा में भी पटाखे जलाने के दुष्परिणामों पर चर्चा की गई। विभिन्न तरीकों से इस त्योहार को मनाने की बात की गई। फिर भी आज जब कक्षा छठी में मैंने चर्चा करते हुए यह बात रखी कि - तो इस बार कितने बच्चे दीवाली पर पटाखे जलाएँगे ? चालीस में से कम से कम दस बच्चों ने हाथ खड़े किए। दो- चार शायद झिझक भी रहे थे। उनसे पूछने पर उन्होंने यही कहा - मैम बिना पटाखों के दीवाली कैसे होगी? हमारा तो उनके बिना मन ही लगता। हम तो बचपन से इसी तरह मनाते आये हैं। बच्चों को फिर समझाया गया। दिल्ली की हवा की बात की गई. अभी से ही हवा पांच गुणा ज़्यादा प्रदूषित है , आगे दीवाली के दिन क्या होगा, कितने लोग उस दिन ठीक से सांस नहीं ले पाएँगे , दूसरों को कष्ट पहुंचा कर ख़ुशी मनाना , क्या यही इस त्यौहार को मनाने का तरीका है ? बहुत बातें हुई। अंत में कुछ बच्चों का मन बदला। लेकिन समस्या यहाँ ख़त्म नहीं होती। बच्चे हैं, फिर मन इस तरफ दौड़ेगा। इसका यही उपाय है कि अभिभावक इस ज़िम्मेदारी को निभाएँ। बच्चों का मन बदलने को लिए ठोस कदम उठाने होंगे। हम और हमारे बच्चे ही इस प्रदूषण का शिकार होंगे। बदलते समय के साथ हम भी अपने को बदलें , झट से बच्चों की ज़िद के आगे घुटने न टेक दें। उन्हें समझाएं और धुएं वाले पटाखों और बमों से दूर रखें।
उषा छाबड़ा

26.10.16 

Saturday, October 1, 2016

story samadhan published in magazine Hindi Chetna


 हिंदी प्रचारिणी सभा कैनाडा की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका हिंदी चेतना के बाल साहित्य विशेषांक में मेरी कहानी 'समाधान' पढ़िए। 

Wednesday, September 14, 2016

 हिंदी और हम
आज हिंदी दिवस है।  सुबह से ही शुभकामनाएँ  भी फेसबुक पर दिखाई दे रहीं है और साथ ही साथ हिंदी की दुर्दशा के बारे में भी लिखा हुआ दिखाई दे रहा है।   
मैं जिन बच्चों को पढ़ाती हूँ, उनके माता- पिता अधिकतर यही बताते हैं कि  उनके घर अंग्रेजी के समाचार पत्र आते हैं , हिंदी की तो यह बस यह पाठ्य  पुस्तक ही पढ़ ले तो  बहुत है।  कई कहते हैं कि  मैम ,  हम कई किताबें लाकर देते हैं पर बच्चा  उन्हें हाथ तक नहीं लगाता।  
असल में समाज में हिंदी के बदले हम अंग्रेजी बोलना ज्यादा अच्छा समझते हैं, उसमें  ज्यादा शान  लगती है।  बच्चा असमंजस की स्थिति में रहता है कि  वह किस भाषा पर अधिक काम करे।  

बचपन में बच्चे के साथ आप जितना समय देंगे, उसके  साथ बैठकर कहानियाँ  पढ़ेंगे , उसके बारे में चर्चा करेंगे , घर में जिस भाषा को महत्त्व देंगे , बच्चे  का रुझान उस ओर  ही होगा। घरों में आजकल  अभिभावकों के पास बच्चे के पास बैठने का समय नहीं, हिंदी भाषा को जब   सिर्फ एक विषय  समझा गया ,जिसमें बच्चा पास तो हो ही जाएगा, वहाँ  बच्चे की पकड़, हिंदी भाषा  पर नहीं बन पाती। 
कई बार जब बच्चों को नाटक सिखाते वक्त स्क्रिप्ट लिखने को कहा जाता है , तो हिंदी भाषा में  नाटक लिखने के बजाय वे रोमन लिपि में हिंदी लिख रहे होते हैं, वे हिंदी लिखने से कतराते हैं , हिंदी की कोई भी किताब पढ़ने से हिचकिचाते हैं।  उनके लेखन में भी गहराई नहीं आ पाती।  
अगर हमें नई  पीढ़ी को हिंदी की ऒर आकर्षित करना है तो सबसे पहले अभिभावकों को  अपनी  मानसिकता को बदलना होगा। घरों में  अंग्रेजी के साथ- साथ हिंदी को भी उतना ही महत्तव देना होगा। प्रकाशकों को  हिंदी की किताबों को और आकर्षित बनाना होगा तभी हम आगे आने वाले समय में हिंदी का उठान देख पाएँगे , नहीं तो हर वर्ष इसी तरह हिंदी की समस्याओं का रोना रोते  रहेंगे।
उषा छाबड़ा 
१४.९.१६ 
   

Tuesday, September 6, 2016

                              वाह रे बीमारी !!!
' बीमारी ' यह शब्द किसी को अच्छा नहीं लगता। न तो  बीमार व्यक्ति को ,न ही  बीमार पड़े हुए व्यक्ति के  सगे - सम्बन्धियों को। परंतु आज मैं आपका ध्यान इसके दूसरे  पहलू की ओर ले जाऊँगी.. 

 सोचिये,  बीमार होने पर लोगों द्वारा आपका ख्याल रखा जाना आपको  कितना अच्छा लगता है।  जब तक शरीर  स्वस्थ रहता है , दूसरों के बारे में कुछ पता ही नहीं होता, सब जैसे कि  अपने अपने कामों में लगे होते हैं , किसी  के लिए समय ही नहीं होता। जैसे ही आप बीमार पड़ते हैं , आपके आस- पास वालों की ज़िन्दगी तो वैसी ही व्यस्तता से भरी होती है , उनकी अपनी दिनचर्या वैसी ही होती है , बस आप थोड़े थम से जाते हैं।  बीमार होने पर हमारा शरीर भी पूरी तरह साथ नहीं देता, हर काम धीरे- धीरे और कई बार आप दूसरों के सहारे पड़  जाते हैं।  ऐसे समय में जब परिवार के सब लोग आपका  ध्यान रखते हैं आपको अच्छा लगता है। सब यही पूछते हैं, खाना खाया कि  नहीं , दवा ली कि नहीं , अरे अभी तक मोसम्मी नहीं खायी , अरे, नारियल पानी को हाथ तक नहीं लगाया, चलो जल्दी पी लो , ठीक हो जाओ ! वाह वैसे तो किसी को इतना होश नहीं रहता लेकिन हाँ बीमार पड़ने पर इन  सभी प्रश्नों की बौछार पड़ने लगती है, मन ही मन आप खुश भी होते हैं. ....   जब किसी को आपके बीमार होने की सूचना मिलती है और वह थोड़ा-सा  अपना समय निकाल कर फोन पर बातचीत या एक छोटा- सा मैसेज ही कर देता है तो बस बीमार मन खुश हो जाता है।  डॉक्टर की दवाई के साथ- साथ यह दवाई भी अपना काम कर रही होती है।   आपके माता - पिता, भैया - भाभी, बहनें  , ननदें  , बच्चे, बड़े, रिश्तेदारों,दोस्त/ सहेलियों , आदि  और आस पड़ोस सब जब आपसे हाल चाल जानने को लिए आपसे बात करते हैं आपको अच्छा लगता है, ऐसा लगता है जैसे कि  आप ठीक हो रहे हैं , लोगों को आपकी परवाह है। 
बीमारी  में तो वैसे सारा दिन बिस्तर पर पड़े रहना बहुत अखरता है , फेसबुक पर भी ज़्यादा देर बैठने का मन नहीं करता , किसी की पोस्ट भी पढ़ने का मन नहीं करता , हाँ आपकी बीमारी  से संबंधित   जितनी जानकारी मिल जाए वह कम ही लगती है।    थोड़ा और कुछ पता चल जाए  , थोड़ा यह  पता चल जाए कि  कब तक ठीक हो जाएंगे यही तमन्ना हर समय होती है।  जीने की यही इच्छा तो पूरे संसार को चला रही है।  स्वस्थ रहें , खुश रहें  , यही सब कहते हैं , मैं तो यह भी चाहूंगी चाहे थोड़े दिनों के लिए ही सही , जनाब ज़रा बीमार भी पड़ कर देखिए  और ठीक  होने के बाद ज़िन्दगी और हसीं लगने लगेगी क्योंकि आपके चाहने वाले जो शायद अपने काम की वजह से आपको थोड़ा भूल गए थे, वे आपके सामने फिर आ खड़े होंगे। दोस्तों, जिंदगी अच्छी  है, अपने प्रिय लोगों का थोड़ा- सा साथ उसे और सुंदर  बना देता है।
 तो फिर देर किस बात की ! अगर आपका कोई नज़दीकी थोड़ा -सा बीमार है तो बस उससे बातें करने के लिए सिर्फ दो मिनट निकालिये, उस व्यक्ति को थोड़ा अच्छा महसूस कराइए, उसके आज के दिन को खुशनुमा कर दीजिये। अधिक नहीं, एक प्यारा - सा मैसेज ही काफी है। 
उषा छाबड़ा 
६. ९. १६  

Thursday, August 25, 2016

नोट
लघु कथा
जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में एक माँ अपनी बच्ची को मंदिर लेकर गई। मंदिर सुंदर सजा हुआ था। बच्ची ने दस रुपये का एक नोट नन्हे कृष्ण जी के झूले में डाल दिया और उन्हें झूला झुलाया। वह बहुत खुश थी। उसकी माँ वहीँ बैठ गई। थोड़ी ही देर में बच्ची माँ के पास आई और माँ के पर्स में और पैसे दूँढने लगी। माँ के पर्स में एक दस का, एक सौ का और एक पांच सौ का नोट था। बच्ची ने पांच सौ का नोट पकड़ लिया और वह चढाने के लिए ज़िद करने लगी। माँ घबरा गयी। पाँच सौ का नोट। !! माँ ने कहा ,"अभी तो भगवान जी को चढ़ाया है , अब और नहीं चढ़ाना।" बच्ची ने कहा ," नहीं , दूसरे भगवान जी जो मंदिर में हैं उन्हें चढ़ाना है।" फिर उसे समझाया गया कि जब एक भगवान को चढ़ाया तो सब मिलकर उसी में से आपस में बाँट लेंगे। बच्ची फिर भी ज़िद पर अड़ी हुई थी। माँ उसे फिर पर्स में से दस रुपये का नोट निकाल कर दे रही थी पर बच्ची थी कि राजी ही नहीं हो रही थी। वह पाँच सौ के नोट को ही चढ़ाने पर ही अड़ी हुई थी। माँ को भी उसे मना करने में दिक्कत महसूस हो रही थी और बच्ची थी कि मान ही नहीं रही थी। थोड़ी देर बाद माँ ने उसे डाँटा ," नहीं ,ये नहीं चढ़ाना है। बार बार ज़िद क्यों कर रही हो ? " तभी बच्ची बोल पड़ी ," ये नोट नरम (सॉफ्ट) सा है , मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे कड़क (हार्ड) नोट चाहिए।" माँ को अब समझ आई कि बच्ची क्या चाहती थी! असल में बच्ची को कड़क नोट उस पेटी में डालना था । पर्स में सिर्फ पांच सौ का नोट ही कड़क था , इसलिए वह उसे लेने की ज़िद कर रही थी। अब समस्या को कैसे सुलझाया जाए। फिर उसे यह कहा गया कि भगवान जी के झूले में यह नरम वाला दस रुपए का नोट डाल आओ और वहाँ से कड़क नोट ले आओ। बच्ची ने देखा कि एक बूढी महिला ने अभी - अभी एक कड़क दस का नोट झूले में डाला है। उसने जल्दी से अपना नोट झूले में डाला और दूसरा कड़क वाला दस रुपए का नोट उठा लिया। वह ख़ुशी- ख़ुशी दस का कड़क नोट पेटी में डाल आई । अब बेटी भी खुश थी और माँ भी !!!
उषा छाबड़ा
२५. ८. १६

Wednesday, August 24, 2016

नन्हा सा सलोना कृष्ण, 
पैरों में पैंजनी और होठों पर बाँसुरी ,
मुँह पर माखन और प्यारी मुस्कान 
ओह , कितना प्यारा रूप है तेरा कान्हा !!
कैसे तू इतना नटखट हुआ ! 
कैसे पूतना को मार गिराया !
कैसे सब गोपियों को वश में किया !
कैसे अपनी उँगलियों पर गोवर्धन उठाया!
कैसे कंस का वध कर डाला!
कैसे द्रौपदी की लाज रखी !
कैसे गीता की रचना की !
कैसे तुमने इतने चमत्कार दिखाए !!
कैसे एक रूप में, इतने रूप समाये!!
तुम कर्मयोगी, तुम दार्शनिक ,
तुम साधारण में असाधारण ,
तुम ही प्राण, तुम ही आधार ,
कोटि नमन तुम्हें हे पूर्णावतार।
उषा छाबड़ा
२४. ८. १६