Saturday, December 31, 2016

नया वर्ष

बाहर कुछ  बच्चे खेल  रहे थे। कभी दौड़ते ,कभी रुकते, कभी हँसते और कभी एक दूसरे  को छेड़ते।  थोड़ी देर में दो बच्चों के बीच लड़ाई हो गई। एक गुस्से में कुछ बोल रहा था, दूसरा भी चुप नहीं हो रहा था। काफी देर तक दोनों एक - दूसरे से नाराज़ रहे। फिर धीरे- धीरे उनमें थोड़ी बात चीत हुई और फिर वे एक साथ खेलने लगे।
दूर अपने घर में बैठी  रजनी  सब कुछ देख रही थी। वह धीरे से उठी और रसोई की तरफ बढ़ी। उसने  नूडल्स बनाये। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। रजनी ने दरवाज़ा खोला। रेखा दफ्तर से थक कर आयी थी। घर में घुसते ही रेखा ने पूछा,  "माँ क्या बनाया है? बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है।" रजनी ने जवाब दिया , "बेटी तुम्हारे लिए नूडल्स बनाए हैं। नए वर्ष की ढेरों शुभकामनाएँ।" नए वर्ष में अपनी सास के बदले हुए व्यवहार को देखकर रेखा मुस्कुरा उठी। तभी रजनी ने उसे गले लगा लिया।

उषा छाबड़ा

Saturday, December 24, 2016

ख़ुशी a short story

                                                                   
Merry Christmas 
आज के इस सुंदर  दिवस पर  चलें हम भी किसी के लिए सांता बन जाएँ 
        किसी के चेहरे पर थोड़ी सी मुस्कराहट ला दें 

        जुगनू बनकर ही सही, कुछ पल उसके भी रोशन कर दें। 


                                  ख़ुशी
सोहनी अपने दफ्तर से लौट रही थी। उसे आज थोड़ी देर हो गई थी। जैसे ही अपने अपार्टमेंट में घुसी वहाँ एक कोने में कुर्सी पर बैठे कपूर अंकल दिखाई दिए। कपूर अंकल बहुत दिनों बाद दिखे थे। 
उन्हें देख कर सोहनी मुस्कराई और पूछा - आंटी कहाँ हैं?
उन्होंने घर की ओर  इशारा किया। उनका घर पहली  मंज़िल पर था।
बूढी कपूर आंटी हमेशा सीढ़ियों के पास कुर्सी पर बैठी मिलती थीं और सोहनी से हर बार कहती थीं कि  कभी आओ, साथ बैठो। आज सोहनी को वैसे ही देर हो रही थी ,पर न जाने क्यों वह ऊपर उनसे मिलने चल पड़ी थी।  वह सीढ़ी चढ़ ही रही थी कि  कपूर आंटी धीरे- धीरे  सीढियाँ उतरती दिखाई दीं। सोहनी वहीँ रुक गई।
कपूर आंटी उसे देखते ही बस ख़ुशी से कह उठीं - अरे! इतने दिनों बाद दिखाई दी हो ? कितना अच्छा लग रहा है , चलो न ऊपर चलो , कभी नहीं आती हो।
आंटी , आपको सरप्राइज देना चाहती थी , अब तो आप मिल ही गई हैं , चलो यहीं मिल लेते हैं।  और बताइए आप कैसी हैं ?
वे तो कुछ सुनने को राजी ही नहीं हुई।  बस ऊपर घर  ही ले गईं उसे.! तभी अंकल  भी ऊपर आ गए।  फटाफट फ्रिज से कुछ चॉक्लेट निकाली और सोहनी को पकड़ा दीं। कपूर आंटी  झट कभी कोई चीज कभी कुछ , बस सामने खाने का सामान रखती चली गयीं। कहा , बस खाओ।
सोहनी उन दोनों को देखे चली जा रही थी। दो महीने विदेश में अपने बच्चों के पास रहकर वे भारत वापिस आए थे। आंटी सोहनी को फटाफट सारी  बातें बताती चली गयीं। सोहनी उनकी आँखों की चमक देख कर मुस्कुरा उठी। उन बूढ़े कपूर अंकल और आंटी के साथ बिताये वे प्रसन्नता भरे पंद्रह मिनट उसे हमेशा याद रहेंगे। 
उषा छाबड़ा
25.12.16 

Sunday, December 18, 2016

A story by khalil-gibran in my voice


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Sunday, December 4, 2016

डियर जिंदगी


     डियर जिंदगी
फिल्में वाकई संचार का एक सशक्त माध्यम हैं।आज डियर जिंदगी फिल्म देखने का मौका मिला।
फिल्म ने बड़ी ही सुंदरता से दिखाया कि  जिस प्रकार शरीर के बाकी अंगों में जब समस्या आती है तब हम डॉक्टर के पास जाकर उसका इलाज करना शुरू कर देते हैं, पर जब हम दिमाग में बोझ लिए चलते हैं , जब कुछ ठीक नहीं चल रहा लगता , जब मन में कोई बात दिक्कत पैदा कर रही होती है , हम उससे जूझने में असमर्थता महसूस करते हैं , फिर भी इस बारे में किसी डॉक्टर की सहायता लेना उचित नहीं समझते।  समाज में इस विषय में सब चुप्पी साध लेते हैं।  
दरअसल कई बार बचपन में , या  कभी किसी रिश्ते में  , या कभी अपने काम को लेकर हम परेशान रहते हैं , उस समय वाकई किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता महसूस होती है जो आपको तटस्थ होकर सुने , आपको स्वयं ऐसे ताकत दिलाए जिससे कि  आप उन उलझनों को सुलझा सकें।  आवश्यकता  होती  है किसी ऐसे अपने की। 
समस्याएं जीवन का हिस्सा हैं पर उनसे  उबरना कई बार आसान नहीं होता। बड़े होते हुए बच्चे कई बार ऐसी स्थिति  से गुजरते हैं। उस समय अगर उसके माँ- बाप उससे  समय -समय पर बात करते रहे , उसकी समस्याओं को सुनें , तो धीरे धीरे बच्चे उनसे बाहर निकल जाते हैं।  बच्चे पर गुस्सा न कर , अपने आप को शांत कर , धैर्य से समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।  जिन बच्चों को माता- पिता का यह साथ नहीं मिलता, वे  इसके लिए अपने मित्रों का रुख कर लेते हैं।  कई बार मित्र सही रास्ता दिखाते हैं  , पर कई बार  यह गलत मोड़ ले लेता है।  
ज़िन्दगी में रफ़्तार जरूरी है , पर इतनी नहीं कि हमारे बच्चे हमसे  पीछे छूट जाएँ। ज़िन्दगी जीने के लिए है, बोझिल बनाकर इसे व्यर्थ न करें।  बच्चों के साथ हँसते -खेलते हर लम्हे का आनंद लें । ज़िन्दगी कीमती है । .ज़िन्दगी वाकई नहीं मिलेगी दुबारा, इसे खूबसूरत बनाएँ।   

Wednesday, November 30, 2016

थैंक यू story



My story   थैंक यू   published in Pratilipi.com , children edition

http://hindi.pratilipi.com/read?id=5754389915500544&ret=/search%3Fq%3Dushachhabra

Tuesday, November 15, 2016

Script writing for NTPC

Wrote the Script for ' Mahapran' for NTPC Annual function held on 12. 11.16


Children's day celebration




Celebrated Children's Day in my apartment with kids .