Tuesday, November 15, 2016

storytelling at IGNCA

got the opportunity to share a story at Kathakar International storytelling Festival during open mic Session held at IGNCA on 11.11.16 



aalekh hamari jimmedari in Hastaksher magazine



आप मेरे द्वारा लिखा आलेख  'हमारी जिम्मेदारी '  निम्नलिखित लिंक पर पढ़ सकते हैं

http://www.hastaksher.com/index.php?ankid=20

Saturday, November 5, 2016

कोट

                             कोट
छुट्टी का दिन था। राधिका अपने काम में व्यस्त थी। कंप्यूटर टेबल पर बैठे वह अपना काम निपटा रही थी। तभी उसे घर  आई  काम करने वाली सुमि ने कहा , "भाभी जी , आज देखो ना बाहर कितना कोहरा है। इस बार ठंड बहुत जल्दी आ रही है, लगता है इस बार  जबरदस्त ठंड पड़ने वाली है ।अभी तो नवंबर शुरू हुआ है और सुबह- सुबह इतनी ठंड लगती है ।"
राधिका काम तो कर रही थी पर जैसे ही उसने सुमि की बात सुनी  बैठे-बैठे वहीं मुस्कुरा दी और कहने लगी ," पिछले साल अधिक सर्दी न पड़ने की वजह से कोई कोट ही नहीं निकला , चलो इस बार तो सब काम आ जाएंगे । "
सुमि बोल पड़ी  ,"यह भी कोई बात हुई भाभी जी ! हम लोगों  का क्या होगा ? इतनी ठंड में पानी में हाथ डालना पड़ता है , कमरे में  भी ठंडे पानी का पोछा  लगाना पड़ता है और चप्पल उतार कर काम करना पड़ता है ।अब आप ही बताओ कड़कती सर्दियों में हमारा गुजारा कैसे होगा ? आपको अपने कोट की पड़ी है। " राधिका सोचने लगी ठीक ही तो कह रही है ।सुमि ने तो जैसे उसकी आंखें  खोल दी थी ।अपने बारे में सोचते -सोचते हम कितना आगे निकल जाते हैं कि दूसरों के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता । तभी राधिका ने उसे कहा," अच्छा , अब सर्दियों में  चप्पल उतार के काम करने की जरूरत नहीं और थोड़ा गीज़र भी चला दिया करूँगी । चिंता मत कर। " राधिका सोच रही थी कि इन सर्दियों में बाकियों का क्या होगा!!

उषा छाबड़ा
5.11.16 

Monday, October 31, 2016

कहानी ' इंतज़ार '


Setu Bilingual सेतु  -  पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित द्वैभाषिक पत्रिका *  में छपी मेरी कहानी ' इंतज़ार ' 

Sunday, October 30, 2016


इंतज़ार (कहानी)

 - उषा छाबड़ा

रानी अपने घर में सोफे पर बैठी सोचे चली जा रही थी। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। बार-बार उसे राकेश की याद आ रही थी। राकेश जो कुछ वर्षों पहले ही विदेश चला गया था। शुरु-शुरु में तो उसकी कुछ ई मेल आईं थीं पर अब उससे संपर्क टूट चुका है। राकेश से वह बहुत नाराज़ थी।दो महीने से उसका कोई अता-पता नहीं। जाने वह कहाँ है, कैसा है ! वहाँ बैठे-बैठे वह अपने ख्यालों में खो गई।
राकेश के साथ समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ जाता था। ऑफिस से उसके साथ ही निकलना और फिर उसके साथ घूमने निकल जाना। कभी किसी फिल्म को देखने, तो कभी अपने घर का कोई सामान खरीदने। कितनी ही मुलाकातें उसकी आँखों के सामने से निकल रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह उसके बिना अपना खाली वक्त कैसे बिताये!

जब से राकेश विदेश गया था, शाम को वह सीधा घर ही आती थी। घर क्या, बस चारदीवारी से घिरे दो कमरे! सिर्फ सन्नाटा और कुछ नहीं! घर की ओर देखने का मन ही नहीं करता था। उसकी जिंदगी अधूरी सी हो गई थी। थोड़ी बहुत सफाई की, कुछ बनाया, बुझे मन से खाया, किसी किताब के पन्ने पलटे, बस धीरे- धीरे आँखें बोझिल हुईं और नींद आ गई। कई बार तो आधी रात में ही नींद टूट जाती और फिर आने का नाम ही नहीं लेती। फिर राकेश को ई मेल लिखने बैठ जाती जिनका जवाब आने की उम्मीद भी अब शायद ख़त्म हो रही थी। था तो केवल इंतज़ार!

आज बाहर बहुत गर्मी बहुत पड़ रही थी। रविवार का दिन था। ऑफिस में भी तो छुट्टी थी। बहुत दिनों बाद घर की ओर ध्यान गया था उसका ! जगह जगह मकड़ी के जाले झूल रहे थे और उसे जैसे कभी दिखाई ही नहीं दिए थे। सुबह से वह घर की सफाई में लगी हुई थी। दोपहर तक तो थक कर चूर हो चुकी थी।

अभी- अभी वह सोकर उठी ही थी और खिड़की के पास आकर बैठ गई। उसने पर्दा हटाया और खिड़की से बाहर झाँका। शाम हो रही थी। बाहर देखा तो आसमान पर काले बादल एक ओर से घिर रहे हैं। बादलों के साए में सूरज ऐसे छिप रहा है जैसे कि वह राकेश के आगोश में चुपचाप छिप जा जाती थी। न चाहते हुए भी राकेश को वह अपनी यादों से जुदा नहीं कर पा रही थी।. वही तो था जिसने इस अनजान शहर में उसे सहारा दिया था। इस नए शहर में वह अकेली, नौकरी की खातिर आई थी। वह तो किसी को भी नहीं जानती थी। राकेश ने ही तो उसकी सूनी जिंदगी में रंग बिखेरे थे।

वह अब आँगन में आकर खड़ी हो गई थी। दूर पेड़ पर बैठी चिड़िया भी बार - बार अपने घोंसले से बाहर आ जा रही थी जैसे कि उसे भी बारिश का इंतज़ार हो। झुलसती गर्मी में वह भी बेहाल सी जान पड़ रही थी। देखते ही देखते ठंडी सी बयार चल पड़ी। पेड़ों की पत्तियाँ जैसे हवा के संग अठखेलियाँ कर रहीं थीं।
ऊपर काले बादल अलग-अलग आकार लिए उमड़-घुमड़ कर आ रहे थे जैसे कि किसी अतिथि के आने का सन्देश दे रहे थे। सारे पेड़-पौधे भी इस सन्देश को सुन झूम पड़े थे।

सिर्फ पेड़-पौधे ही क्यों, क्या मनुष्य नहीं! नीचे चलते हुए लोग जिनके चेहरे पर कुछ समय पहले चिंता की लकीरें थीं, प्यास बुझाने के लिए जहाँ पानी बटोरने की जद्दोजहद में पड़े थे , वे भी बारिश के आगमन की ख़ुशी को अपने चेहरे से छिपा नहीं पा रहे थे। एक बार ऊपर देखते , प्रसन्न हो फिर आगे की ओर बढ़ जाते। टप! पहली बूँद गिरी , जिसे प्यासी धरती ने सोखने में एक पल भी नहीं लगाया, बूँद पूरी तह गायब हो गई। फिर, टप – टप- टप---- और जैसे कि किसी नृत्यांगना के पायल की झंकार सबको मदमस्त करने लगी हो।

नन्हीं बूँदे धरती की प्यास बुझा रही थी। रानी मौसम के बदलाव से मन में बदलाव महसूस कर रही थी। जैसे ही कुछ बूँदें उसके चेहरे पर पड़ी, उसे राकेश से मिलने का वह दिन याद आ गया जब ऑफिस के बाहर यूँ ही खड़ी थी और बारिश हो रही थी। राकेश भी उसके ऑफिस में ही काम करता था और उसके पास आकर उसने अपनी गाड़ी रोकी थी। राकेश ने ही उसे तेज बारिश में घर पर छोड़ा था। बारिश में राकेश के साथ हुई पहली मुलाकात कितनी हसीन थी। मन में कुछ न होते हुए भी पता नहीं क्या था जो कि बार-बार दस्तक दे रहा था।
बारिश अब तेज हो रही थी और कितना अच्छा लग रहा था रानी को ! आँगन में जैसे बारिश की बूंदें बेतहाशा गिर रही थीं जैसे कि कह रही हों कि लो तुम्हारा इंतज़ार ख़त्म हुआ ! नीचे सड़क पर धरती तृप्त होती दिखाई दे रही थी। आस-पास पत्तों पर बारिश की बूँदे गिर रही थी। नीचे देखा, जो लोग सड़कों पर थे, वे इकट्ठे होकर पेड़ों के नीचे खड़े हो रहे थे। सभी को घर पहुँचने की बेताबी थी, पर फिर भी भीगते हुए भी उस वर्षा का आनंद ले रहे थे।
तभी रानी ने देखा, दूर एक झोंपड़ी दिखाई दे रही थी, टूटी–फूटी सी! उसका छज्जा अंदर की ओर शायद चू रहा था। एक औरत कभी एक बर्तन लेकर किसी छेद के नीचे रखती तो कभी कोई बाल्टी लेकर अपने घर के किसी एक कोने की ओर भागती। कभी कोई सामान गीला होने से बचाती तो कभी कोई। चेहरे पर सिर्फ शिकन था , कैसे बचा पाएगी वह अपने इस टूटे- फूटे आशियाने को! बाहर जहाँ सब लोग वर्षा का आनंद ले रहे थे, वहीँ इस औरत के लिए ये बारिश की बूँदें चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर रही थीं।

उसका बच्चा इन सब बातों से बेखबर, अपने घर के बाहर खड़ा था। दीन - दुनिया से दूर, अपनी ही धुन में बारिश की टपकती बूँदों से तरह तरह बारिश की बूँदों से खेल रहा था। एक बूँद जैसे ही टपकती उसे अपनी उँगलियों से छिटका देता, अपने चेहरे पर पड़ती नन्हीं बूँदों को पोंछते जाता , खिलखिलाता हुआ हँसता । उसे कितना आनंद आ रहा था ! उसके चेहरे पर कितनी खुशी थी ! उसे सिर्फ अपना खेल समझ आ रहा था, बस खेल !

रानी भी उसे देखकर खिलखिला पड़ी। अपनी बातों को तो जैसे वह भूल ही गई। राकेश के प्रति उसके मन में जो मैल था, वह भी बारिश में धुल गया था। आगे बढ़ने का नाम है ज़िन्दगी ! आज धरती में सोए कितने ही बीज जाग उठेंगे। परिस्थितियां जैसी भी हों, वे उगेंगे। चाहे तो पल- पल को बोझ समझ कर बिता दो या जीवन के पलों को आनंद से जी लो।

उसे भी राकेश को भूलना ही होगा! बारिश ने आज उसे नई राह दिखा दी थी। राकेश का इंतज़ार ख़त्म हुआ। वह अपने कमरे में मुस्कराते हुए चली गई और बड़े ही चाव से अपना कमरा ठीक करने लगी।

Wednesday, October 26, 2016

दीवाली

दीवाली 
दीवाली नजदीक आ रही है। एक बार फिर हम सब इस त्योहार को ख़ुशी- ख़ुशी मनाएँगे। 
स्कूलों में फिर से पटाखों के बिना दीवाली मनाने की बात पर ज़ोर दिया गया है। उन्हें वीडियो दिखाए गए , प्रार्थना सभा में भी पटाखे जलाने के दुष्परिणामों पर चर्चा की गई। विभिन्न तरीकों से इस त्योहार को मनाने की बात की गई। फिर भी आज जब कक्षा छठी में मैंने चर्चा करते हुए यह बात रखी कि - तो इस बार कितने बच्चे दीवाली पर पटाखे जलाएँगे ? चालीस में से कम से कम दस बच्चों ने हाथ खड़े किए। दो- चार शायद झिझक भी रहे थे। उनसे पूछने पर उन्होंने यही कहा - मैम बिना पटाखों के दीवाली कैसे होगी? हमारा तो उनके बिना मन ही लगता। हम तो बचपन से इसी तरह मनाते आये हैं। बच्चों को फिर समझाया गया। दिल्ली की हवा की बात की गई. अभी से ही हवा पांच गुणा ज़्यादा प्रदूषित है , आगे दीवाली के दिन क्या होगा, कितने लोग उस दिन ठीक से सांस नहीं ले पाएँगे , दूसरों को कष्ट पहुंचा कर ख़ुशी मनाना , क्या यही इस त्यौहार को मनाने का तरीका है ? बहुत बातें हुई। अंत में कुछ बच्चों का मन बदला। लेकिन समस्या यहाँ ख़त्म नहीं होती। बच्चे हैं, फिर मन इस तरफ दौड़ेगा। इसका यही उपाय है कि अभिभावक इस ज़िम्मेदारी को निभाएँ। बच्चों का मन बदलने को लिए ठोस कदम उठाने होंगे। हम और हमारे बच्चे ही इस प्रदूषण का शिकार होंगे। बदलते समय के साथ हम भी अपने को बदलें , झट से बच्चों की ज़िद के आगे घुटने न टेक दें। उन्हें समझाएं और धुएं वाले पटाखों और बमों से दूर रखें।
उषा छाबड़ा

26.10.16 

Saturday, October 1, 2016

story samadhan published in magazine Hindi Chetna


 हिंदी प्रचारिणी सभा कैनाडा की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका हिंदी चेतना के बाल साहित्य विशेषांक में मेरी कहानी 'समाधान' पढ़िए। 

Wednesday, September 14, 2016

 हिंदी और हम
आज हिंदी दिवस है।  सुबह से ही शुभकामनाएँ  भी फेसबुक पर दिखाई दे रहीं है और साथ ही साथ हिंदी की दुर्दशा के बारे में भी लिखा हुआ दिखाई दे रहा है।   
मैं जिन बच्चों को पढ़ाती हूँ, उनके माता- पिता अधिकतर यही बताते हैं कि  उनके घर अंग्रेजी के समाचार पत्र आते हैं , हिंदी की तो यह बस यह पाठ्य  पुस्तक ही पढ़ ले तो  बहुत है।  कई कहते हैं कि  मैम ,  हम कई किताबें लाकर देते हैं पर बच्चा  उन्हें हाथ तक नहीं लगाता।  
असल में समाज में हिंदी के बदले हम अंग्रेजी बोलना ज्यादा अच्छा समझते हैं, उसमें  ज्यादा शान  लगती है।  बच्चा असमंजस की स्थिति में रहता है कि  वह किस भाषा पर अधिक काम करे।  

बचपन में बच्चे के साथ आप जितना समय देंगे, उसके  साथ बैठकर कहानियाँ  पढ़ेंगे , उसके बारे में चर्चा करेंगे , घर में जिस भाषा को महत्त्व देंगे , बच्चे  का रुझान उस ओर  ही होगा। घरों में आजकल  अभिभावकों के पास बच्चे के पास बैठने का समय नहीं, हिंदी भाषा को जब   सिर्फ एक विषय  समझा गया ,जिसमें बच्चा पास तो हो ही जाएगा, वहाँ  बच्चे की पकड़, हिंदी भाषा  पर नहीं बन पाती। 
कई बार जब बच्चों को नाटक सिखाते वक्त स्क्रिप्ट लिखने को कहा जाता है , तो हिंदी भाषा में  नाटक लिखने के बजाय वे रोमन लिपि में हिंदी लिख रहे होते हैं, वे हिंदी लिखने से कतराते हैं , हिंदी की कोई भी किताब पढ़ने से हिचकिचाते हैं।  उनके लेखन में भी गहराई नहीं आ पाती।  
अगर हमें नई  पीढ़ी को हिंदी की ऒर आकर्षित करना है तो सबसे पहले अभिभावकों को  अपनी  मानसिकता को बदलना होगा। घरों में  अंग्रेजी के साथ- साथ हिंदी को भी उतना ही महत्तव देना होगा। प्रकाशकों को  हिंदी की किताबों को और आकर्षित बनाना होगा तभी हम आगे आने वाले समय में हिंदी का उठान देख पाएँगे , नहीं तो हर वर्ष इसी तरह हिंदी की समस्याओं का रोना रोते  रहेंगे।
उषा छाबड़ा 
१४.९.१६