Saturday, February 20, 2016

                                    एक कहानी
आज मैं स्कूल बस से जब अपने स्कूल की ओर जा रही थी तो पास ही कक्षा चार की एक  छात्रा बैठ गई  मैं एक किताब पढ़ रही थी जिसमें छोटी-छोटी कहानियाँ थी वह लड़की भी मेरी किताब में झाँकने लगी थोड़ी देर बाद उसने मुझसे पूछा,” मैम , क्या आप भी छोटी कहानियाँ पढ़ना पसंद करती हैं ?”
मैंने कहा,“हाँ , मुझे छोटी कहानियाँ पढ़ना अच्छा लगता है
उसने कहा, “मुझे भी छोटी कहानियाँ पसंद हैं
मैंने पूछा, “क्यों ?”
“मैम, कहानी बड़ी होने से बीच में छोड़ने का मन नहीं करता और फिर बहुत पढ़ाई भी करनी होती है, इसलिए ज्यादा समय नहीं निकाल पाती
फिर मैंने कहा, “अच्छा
“मैम, मैं आपको एक कहानी सुनाऊँ?” लड़की ने  पूछा
मैंने कहा, “सुनाओ” मैंने अपनी किताब बंद की और उसकी बात सुनने लगी  
उसने बताया कि उसकी मम्मी ने उसे एक किताब से यह कहानी सुनाई थी, जिसमें एक  शैतान अपने मालिक से कहता है कि मुझे काम नहीं दोगे तो मैं तुम्हें मार डालूँगा इसलिए फिर उसका मालिक एक सीढ़ी बनाता है जिसमें वह उस शैतान को यह काम दे देता है कि वह सीढ़ी से ऊपर नीचे - उतरे इस तरह वह आदमी उस शैतान को ऐसे काम में लगा देता है जो कभी ख़त्म नहीं होता और उसके चंगुल से  छूट जाता है
 बच्ची कहानी सुना कर कहने लगी, “ रात को सोते वक्त मैं भी सीढ़ी पर चढ़ने- उतरने की बात सोचती हूँ और मुझे अच्छी नींद आ जाती है
मैंने उससे पूछा, “यह तुम क्यों करती हो ?”
उसका जवाब था कि किताब में ऐसा लिखा था और उसकी मम्मी ने उसे समझाया था
उसकी बात  सुनकर अच्छा लगा मैं सोच में पड़ गई एक कहानी ने उसके मानस पटल पर इतना गहरा असर किया कि वह बचपन से ही ध्यान लगाना सीख गई अनजाने ही रात को सोने से पहले वह ध्यान करती है अगर अभिभावक बचपन से ही बच्चों को सुंदर कहानियाँ सुनाएँ , उनके साथ सही मायने में वक्त बिताएँ, तो बच्चे क्यों नहीं सुंदर फूल की तरह खिलेंगे !
उषा छाबड़ा

२०.२.१६ 

Tuesday, February 16, 2016

                                                             मुस्कान
शाम के सात  बज रहे थे । सुमित कॉलेज से लौटते समय मेट्रो स्टेशन पर उतरा और घर जाने के लिए रिक्शे की तलाश करने लगा । तभी पीछे से एक रिक्शे वाले ने आवाज लगाई , कहां जाना है भैया ? सुमित ने पीछे मुड़कर देखा । एक 25 - 30 साल का दुबला-- पतला युवक वहां खड़ा था । उसने सिर पर गमछा था लपेटा हुआ था । सुमित ने पूछा  - जनकपुरी चलोगे ? 
रिक्शे  वाले ने कहा  - जी साहब 
सुमित  ने पूछा  - कितने पैसे?
रिक्शे  वाले ने कहा - जी, 40  रुपये ।
सुमित आगे बढ़ गया । तभी रिक्शा वाले ने फिर से आवाज़ लगाई- कितना दोगे  साहब ?
मेरा तो रोज का आना जाना है । तीस रुपये दूँगा ।
रिक्शे वाले ने पहले कुछ सोचा और फिर कह  उठा -  चलिए, ले चलता हूँ । सुमित रिक्शे में बैठ गया
 रिक्शेवाला रिक्शा चलाने लगा । सुमित भी दिन भर की बातों के बारे में सोचने लगा । उसकी  गली के थोड़ा पहले रिक्शा जैसे ही मुड़ने  लगा , किसी  की आवाज ने उसे चौंका दिया । सड़क पर  खड़ा व्यक्ति रिक्शे वाले से कह रहा था – अरे! तुम्हारे  रिक्शे का पहिया बाहर क्यों निकल रहा है? जरा ध्यान से चलाओ । रिक्शे  वाले ने एक तरफ झुक कर देखा । हां, उसके पहिए की के नट बोल्ट कहीं पीछे खुल गए और इसलिए रिक्शे का पहिया  बार- बार बाहर निकल रहा था । अब रिक्शेवाला धीरे-धीरे रिक्शा चलाने लगा । बार-बार उसकी निगाह वहीँ  पहुंच जाती । सुमित भी  घबरा गया था । वह भी  बार-बार पहिए को देख रहा था । कहीं  पहिया बाहर आ गया तो ! यह  सोचकर  वह बहुत डर गया था । घर आने ही वाला था । रिक्शावाला मायूस -सा  दिख  रहा था । सुमित ने पूछा  -क्या बात है भैया? रिक्शे  वाले ने कहा - क्या बताऊँ  भैया! अब इसकी मरम्मत में भी पैसे लग जाएंगे । वैसे ही दो जून का खाना  मुश्किल से जुटा पाता हूँ , ऊपर से इतना खर्च.! सुमित ने कहा - ठीक तो कराना ही पड़ेगा  भैय्या ।
बातों ही बातों में सुमित का  घर आ गया । सुमित ने कहा - बस भैय्या , रोक देना । वह रिक्शे से उतरा ओर अपने पर्स में से उसने पैसे निकालकर  रिक्शे वाले को दे दिए , उसके कंधे को थपथपाया । आँखों ही आँखों में धन्यवाद कहा और घर की ओर बढ़ गया । रिक्शे  वाले ने पैसे गिने । चालीस रुपये थे ।

बात तो तीस रुपये की हुई थी और ये तो चालीस रुपये हैं । उसने सोचा गलती से दे दिए हैं  । वह वापिस करने के लिए सुमित को  आवाज़ लगाने ही वाला था लेकिन खर्च के बारे में सोचकर  चुप रह गया । वह मन ही मन खुश हो गया कि चलो कुछ तो आराम हो गया । वह यह सोच कर मुस्कुरा उठा   सुमित के चेहरे पर संतोष की झलक थी , उसने  रिक्शे वाले का थोड़ा बोझ जो हल्का कर दिया था । उसके होठों पर मुस्कान थी । जाने पूरे दिन की थकावट कहाँ छूमंतर हो गयी थी !
उषा छाबड़ा
१६.२.१६
इस कहानी को नीचे दिए लिंक पर सुन भी सकते हैं -

Tuesday, January 26, 2016

मेरे द्वारा लिखी गई कुछ किताबें

Monday, January 25, 2016




स्वेटर
जनवरी में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । हमेशा की तरह दोनों बहनों ने घंटी बजाई और काम करने के लिए घर के अंदर आ गयीं। बड़ी बहन पिंकी बर्तन मांजने लग गयी और मीनू झाड़ू  लगाने  के लिए अंदर कमरे में आ गयी।  मीनू अभी झाड़ू लगा ही रही थी कि रसोई से  खाँसने की आवाज़ आई।  अंदर कमरे में बैठी  रश्मि ने उसके खाँसने  की आवाज सुनी और पूछ लिया ,  "अरे  पिंकी, तुम इतनी खाँसी क्यों  कर रही  हो, क्या बात है?"  " जी , कुछ नहीं वो  कल से खाँसी हो रही है और थोड़ा सा बुखार भी है." पिंकी ने जवाब दिया।
रश्मि ने कहा ," अरे पिंकी, जब तबीयत ठीक नहीं है तो तुम क्यों आई हो ? अब बुखार भी चढ़ा हुआ है।  तुम वापस चले  जाओ।“ पिंकी ने कहा," नहीं, नहीं ,मैं घर नहीं जाऊँगी , घर पर मैं खाली बैठ कर क्या करुँगी , अभी थोड़ा सा काम कर के मैं चली जाऊँगी।" रश्मि ने पूछा ,"कोई दवाई वगैरह ली है क्या ?"
पिंकी बोली, "हांजी।" तभी मीनू बोल पड़ी ,"  वो एक जगह काम करते हैं न हम, उन्होंने  पीने के लिए सिरप दी है , वही पी है इसने.” तभी रश्मि ने देखा कि पिंकी ने तो  बस एक पतला- सा स्वेटर पहना है।“  रश्मि ने तेज स्वर में कहा, “पिंकी, क्या तुम्हे गर्मी ज्यादा लगती है? इतना पतला सा स्वेटर पहन सुबह काम पर आई हो।“ मीनू बोल पड़ी, "  इसके पास तो यही स्वेटर है और मेरे पास भी।" अब तक रश्मि की निगाह मीनू पर नहीं पड़ी थी। जब उसने उन दोनों को एक साथ देखा तो सन्न रह गई। इन दोनों ने इतने पतले स्वेटर पहने हैं कि वो तो इस सर्दी में  कुछ भी  नहीं हैं।  हे भगवान , वह तो अचंभित रह गयी।  कैसे प्रतिदिन ये दोनों लड़कियाँ घर से निकलती होंगी ,   बुखार में भी यह स्वेटर पहन कर काम करने हिम्मत जुटा कर आती होंगी। एक हम लोग हैं कितने स्वेटर अलमारी में होते हुए भी और खरीद कर अलमारी में रख लेते हैं , इतने कपड़े ओढ़ कर भी  सर्दी का रोना रटते  रहते हैं और कहाँ इतनी छोटी उम्र की लड़कियाँ कभी मुँह से उफ़ नहीं निकालती।  एक बार भी मुँह से माँगा नहीं कि आंटी जी एक स्वेटर हो तो निकाल देना।  घर में कपड़े धोने वाली तारा  भी तो आती है , पर वह तो नहीं झिझकती। फिर ये दोनों कितनी छोटी हैं पर कभी कुछ माँगा ही नहीं! रश्मि को याद आया ,कुछ  महीनों पहले इनके पिता की मृत्यु होने पर भी  इनकी माँ  ने कभी सहायता के लिए कुछ नहीं माँगा , कभी भी पैसे बढ़ाने की बात नहीं की , कभी अपना दुःख  नहीं बताया , शायद माँ  के ही संस्कार थे कि दोनों बेटियाँ कभी  कुछ नहीं माँगती।  रश्मि को जैसे थोड़ी देर बाद कुछ होश आया ।  वह अंदर कमरे में गयी।  उसने अपने बेटे की जैकेट उसे दी जो अब उसके बेटे को छोटी हो गयी थी।  अपने सामने पिंकी को पहनने के लिए कहा।  पिंकी को वह पूरा आ गया था।  उसके चेहरे पर ख़ुशी देखकर रश्मि को भी शांति हुई। पिंकी को देख मीनू भी खुश हो गयी।  पिंकी ने काम निपटाया और चली गयी।  मीनू जब काम ख़त्म करके जाने लगी तो रश्मि ने उसे भी एक पुरानी जैकेट दी ।  मीनू भी खुश हो गयी।  रश्मि ने पूछा, “तुम्हे कैसा लगा था, जब मैंने तुम्हारे सामने तुम्हारी बहन को जैकेट दी और तुम्हें नहीं ?” तो मीनू ने कहा , “आंटी जी, मेरी बहन को बुखार था और में उसकी चिंता कर रही थी ।  जब आपने जैकेट दी तो मुझे उसके लिए बहुत अच्छा लगा।” उसकी आँखों में भी ख़ुशी थी।  अपने  जैकेट की चेंन बंद करे हुए दरवाजे से निकलते वक्त उसने कहा,” थैंक यू ,आंटी जी।“
उषा छाबड़ा
२६.१.१६
इस कहानी को आप मेरी आवाज़ में नीचे दिए लिंक पर सुन सकते हैं
radioplaybackindia.blogspot.com






Tuesday, January 12, 2016

उसके आने की तिथि का पता चलते ही इंतज़ार की घड़ियाँ आरम्भ हो जातीं। सबसे मिलने को दिल बेचैन हो जाता। यह पहली बार नहीं हो रहा था। इतने वर्ष बीत गए लेकिन हाल वैसा ही है। जब भी पुस्तक मेला और प्रगति मैदान की बात हो तो कैसे घर पर बैठा रहा जा सकता है! किताबों से मिले बिना कैसे रहा जा सकता है! पहले दोनों छोटे बच्चों को साथ ले , पति के साथ चल पड़ती थी। उन दोनों को कभी कोई किताब दिखाती तो कभी कोई। यह अच्छी है, इसे देखो,इसके चित्र कितने अच्छे हैं, बहकाते हुए, फुसलाते हुए उन्हें कुछ घंटे के लिए व्यस्त रखती।
आज बड़ा बेटा तो साथ नहीं गया था लेकिन छोटा बेटा किसी स्टाल में जो एक बार चला जाता तो निकलने का नाम नहीं ले रहा था। मैं इनकी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी, अच्छा लग रहा था कि उसे भी पुस्तकों से दोस्ती हो गयी थी. आज हम जब थक कर उसे बुला रहे थे तो कहता है मम्मी देखो न , अभी कितनी किताबों से तो मिले ही नहीं।
अपने बच्चों को आप सब भी बचपन से ही पुस्तकों से दोस्ती करवाएँ। , इस दुनिया का अपना ही आनंद है।
उषा छाबड़ा


Thursday, January 7, 2016

मुझे चाहिए वह किताब
मुझे चाहिए वह किताब ,
जिसमें हों प्रकृति के सुन्दर दृश्य,
जहाँ मैं कल्पना के घोड़ों पर बैठ दूर- दूर जा सकूँ ,
जो मेरे मन में प्रश्न उत्पन्न करे,
जहाँ ज्ञान हो,
विज्ञान हो,
आनंद हो,
समस्याएँ हों ,
समाधान हों ,
कहानियाँ जो परियों की हों ,
कहानियाँ जो वैज्ञानिकों की हों,
कहानियाँ जिनमें दादा- दादी हों ,
कहानियाँ जिनमें नाना- नानी हों ,
कहानियाँ जो रिश्तों की हों ,मित्रों की हों ,
कहानियाँ जो मेरी दुनिया की हों ,
जहाँ कंप्यूटर और इंटरनेट की बातें हों ,
मोबाइल हों , आई पैड हो , रॉकेट हों,
तो साइकिल हों , फूल हों , पौधे हों, पक्षी भी हों ,
ऐसी किताब जो मेरी दुनिया को जाने ,
ऐसी किताब जो मुझे समझे।
उषा छाबड़ा

Wednesday, January 6, 2016

मुझे कई साल हो गए अपने विद्यालय के बच्चों को पढ़ाते हुए। बच्चों के बीच बच्चा बन जाना , उनसे बातें करना, उनके बारे में जानना, पुस्तकालय से कई बार किताबें ला- लाकर दिखाना , कई बार अपनी लिखी कहानियों , कविताओं की चर्चा करना , पढ़ाने के साथ साथ बाहरी जगत से अवगत कराना आदि। उन्हीं बच्चों के साथ का मेरा संसार । इतने वर्षों का सफ़र , मेरा अनुभव।
नव वर्ष के शुरूआती दिनों में ही मुझे कुछ नया अनुभव प्राप्त हुआ। मेरा मिलना ' बालसहयोग' एवं 'साक्षी' जैसी संस्थाओं के बच्चों से हुआ। अपने द्वारा लिखी गई कविता की पुस्तकें' ताक धिना धिन' जब इन बच्चों के बीच बाँटी तो मन जाने कहाँ उड़ चला। छोटे- छोटे बच्चे जिस प्रकार इन पुस्तकों को पाने के लिए लालायित थे, पढ़ने का प्रयास कर रहे थे , वह देखने लायक था। कितने उत्साह के साथ इन्होंने उन कविताओं को पढ़ा , उसे आप संलग्न चित्रों में देख सकते हैं। इनमें से कई बच्चों ने तो हाथों हाथ इनके चित्र बना के दिखा दिए। ये संस्थाएँ इन बच्चों के लिए कितना कुछ कर रही हैं, जानकर मन को बहुत अच्छा लगा। मैंने पाया कि सारे बच्चे एक समान ही होते हैं। सबमें कोई न कोई गुण है। आवश्यकता है सही समय पर इन्हें पहचानने की, उनके मार्गदर्शन की। ' बालसहयोग' एवं 'साक्षी' द्वारा उठाये गए कदम वाकई कई जिंदगियों को रोशन कर रहे हैं। जानती थी कि ऐसी कई संस्थाएँ समाजसेवा के काम में संलग्न हैं, लेकिन आज इन्हें करीब से देखने का मौका मिला। मन प्रफुल्लित हो उठा।
उषा छाबड़ा